समीक्षा खाली भरे हाथ। मूल लेखक : आचार्य जगदीश चंद्र मिश्र I
अनुवाद राम
लाल वर्मा राही I
समीक्षक : रौशन जसवाल
शुष्कवृक्षाश्च
मुर्खाश्च न नमन्ति कदाचन ।।
रुकावट बोध
कथा भी जीवन यात्रा को सम्बोधित करती है । इस कथा में जीवन में करुणा, दया के एक दूसरे की मदद करने को विषय बना सारगर्भित सन्देश दिया गया कर।
इस विषय को ठींड और जवाणस बोधकथा में भी लिया गया जो वास्तव में प्रेरक और
प्रभावशाली है स्त्री पुरुषों जीवन सम्बंधों पर खाली भरे हाथ पुस्तक में जवाणसो री
तमन्ना, जवाणसा रा जीऊ, जवाणसा री
चुनरी, एस्स जमाने री प्रेमिका, जवाणसो
रा प्यार, बोध कथाएं है। ये बोध सम्बंधों में ईमानदारी समाज,
परिवार और प्रत्येक कार्य के प्रति स्नेह, आत्मीय
सम्बंधों और कार्यशील रहने का सन्देश देती है। माछो री माटी, माछो रा आपणा, माछो री कमजोरी, ठींडो री मजबूरी कुछ ऐसी बोध कथाएं है जो मनुष्य मात्र को कर्तव्य बोध का
अहसास के पात्र है। हमारे खान पान में मांसाहार और शाकाहार में से श्रेष्ठ आधार को
व्यक्त करती बोध कथाएं मांसाहारी रा कारण और 'शाखाहारी रा
जोर प्रेरक बोध बोधकथाए है तो आहार के चयन
उपयोगिता पर प्रकाश डालती है। पापी सरीर बोध कथा में दशहरा के माध्यम बुराई के
समूल नाश औ स्वस्थ जीवन यापन पर जोर दिया। गया है।
शर्मी रा पर्दा बोध कथा में प्रातःकाल और रात के वार्तालाप के माध्यम से सुबह जल्दी जागने के महत्त्व को दर्शाया गया जो वास्तव में तार्कित और युक्ति संगत है। कामणा बोधकथा में भी दीपक के दूसरे को प्रकाश देने के माध्यम से जीवन में लोक कल्याण और जन सेवा में लगाने का सन्देश दिया गया है।
पुस्तक की विशेषता है कि कठिन पहाड़ी शब्दों के पाद टिप्पणी में
अर्थ दिए गए है जो पाठकों को
कठिन पहाड़ी शब्दों को समझने में सहायता करते है।
पहाड़ी में अनुवाद बेहद कम हो रहा है लेकिन राम लाल वर्मा राही का ये प्रयास
श्लाघनीय है। पुस्तक पठनीय, संग्रहणीय तो है ही साथ ही
बच्चों के चरित्र निर्माण और दृष्टिकोण विकास में सहायक है।
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