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  • जगदीश बाली की पुस्तक चल चला चल  का आज दिल्ली में विमोचन 
  • जगदीश बाली की पठनीय संग्रहणीय पुस्‍तक
  • श्री कृष्‍ण भानू जी की फेसबुक वॉल से

    लेखक सिर्फ लेखक होते हैं। लेखक को सियासत नहीं भाती। उनकी अपनी दुनियाँ अलग ही होती है। उन्हें न मॉल भाता है न कॉफी हाउस !
    लेकिन समय बदला और लेखक अनेक दलीय विचारधाराओं के दलदल में धँसते चले गए। यहीं से इन कथित बुद्धिजीवियों में भीषण दुर्भाग्यपूर्ण भिड़ंत प्रारम्भ हुई, जो अब थमने का नाम नहीं लेती।

    उपन्यासकर रिचर्ड हूकर याद आ गए। उन्हें M.A.S.H. उपन्यास लिखने में सात वर्ष लगे। पब्लिशर के पास गए तो पहला पृष्ठ पढ़ने के बाद प्रकाशक ने कहा, " यह उपन्यास केवल रद्दी की टोकरी में फैंकने लायक है। इसे कोई छोटा-मोटा प्रकाशक भी नहीं छापेगा।" कुल इक्कीस प्रकाशकों ने उनका उपन्यास खारिज कर दिया, पर लेखक ने किसी का पोंचा नहीं पकड़ा, क्योंकि वह लेखक था, बनिया नहीं।

    अंततः एक गुणी व पारखी प्रकाशक ने उपन्यास छाप दिया। कुछ ही समय में वह उपन्यास बेस्टसैलर बन गया। इस उपन्यास पर एक धारावाहिक बना, फिर एक फीचर फिल्म भी बनी, जिसने देस दुनियां में धूम मचा दी।

    रिचर्ड हूकर हम आप भी बन सकते हैं। खुद पर भरोसा रखिये। सियासत से दूर रहिये। कभी खुद को ब्राह्मण, कभी दलित, कभी बनिया मत बनने दीजिये, सिर्फ लेखक ही रहिये। रिचर्ड को अधिक जानना है तो खोजने की तकलीफ तो करनी ही पड़ेगी। फोटो देखिये और खोज लीजिये।
  • नीरज मुसाफिर की पुस्तक । पठनीय और संग्रहनीय। 

  • "अश्रुनाद " पुस्तक का डाँ. उमेश चन्द श्रीवास्तव जी द्वारा रचित 'मुक्तक संग्रह है । 116 पृष्ठों में 325 सुंदर मुक्तक  हैं जिन्हें विभिन्न 10 शीर्षकों में वर्गीकृत किया गया है ।
    सुंदर कवर में सज्जित पठनीय पुस्तक । 
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       हिमाचल के उदीयमान कवि मनोज चौहान का कविता संग्रह पत्थर तोड़ती औरत मिला । पुस्तक अत्यन्त आकर्षक है । बहुत बहुत बधाई ।इनकी कविताओं से गुजरते हुए हमें रोजमर्रा के जीवन में परिवार से परिवेश तक की स्थिति और घटनाओं की अनेकों झांकियां परिलक्षित होती है ।कभी व्यवस्था से जूझते आदमी तो कभी पहाड़ी जीवन की जटिलताओं को सहजता से देखा जा सकता है । कवि ने अपने जीवन और आसपास जो देखा या अनुभव किया वो कहीं कहीं तो बिन किसी कसावट या बुनावट के हू ब हू शब्दों में पिरो दिया ।मानव जीवन की अनेक सूक्ष्म अनुभूतियों को बिना किसी बाह्य आरोपण के कवि ने शब्दों का जामा पहनाया है,चाहे वो आदमी के भीतर पनप रही कई तरह की अवधारणाए हो ,चाहे लोक जीवन में व्यप्त अनेक विसंगतियां हो या मानव मूल्यों का क्षरण या रिश्तों की अहमियत, बड़ी सहजता से इनकी कविताओ में अभिव्यक्ति हुई है। यद्यपि कवि ने शिल्प को ज्यादा तरजीह नही दी है , अपनी स्वाभाविक काव्य कला से आत्मानुभूति को सरल भाषा में नैसर्गिक अभिव्यक्ति दी है। निःसन्देह कवि मनोज चौहान में कविता की अपार सम्भावनाएं है

    ·        डॉ सत्‍य नारायण स्‍नेही


  • डेज़ी एस. शर्मा


  • काव्‍य संग्रह के रचनाकार
    डॉ.अनीता पंडा, आशा रौतेला मेहरा, भारती कुठियाला, चन्दा फुलारा, गीता कैथल, ज्योति गुप्ता, कुन्ता देवी, मोनिका अग्रवाल, ममता देवी, ममता पाण्डेय, नीलम शर्मा ‘अंशु’, नीना अन्दोत्रा पठानिया, संगीता पुरी श्रेया, सपना शर्मां रूचि, शिखा श्याम राणा, डॉ. सुरेखा शर्मा, सु-मन कपूर, विनय पंवार, अनन्त आलोक, अशोक दर्द, अश्विनी रमेश, दीपक भारद्वाज, दिनेश शर्मा, गोपी चन्‍द डोगरा, हर्शेन्द्र मैहता, हितेन्द्र शर्मा, कैलाश मंडलोंई, कमलदेव कमल, मदन शेखपुरी, मनोज चौहान, नरेश देयोग, निर्मल गुप्ता, परितोष कुमार 'पीयूष, प्रेम सिंह कश्यप, डॉ. रजनीकांत शर्मा, राजीव मणी, रतन चन्द निर्झर, संजय ठाकुर, सुशील भीमटा, शिव राज सिंह, ताजी राम कश्यप, विनोद ध्रब्याल राही और रौशन जसवाल विक्षिप्त


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