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10 March 2024

संवेदना, टीस और हौंसले का संगम...... अनकहे जज़्बात

March 10, 2024 0

 काव्य संग्रह   अनकहे जज़्बात - राजीव डोगरा  !   डॉनीरज पखरोलवी ! 

अनकहे जज़्बातराजीव डोगरा जी का प्रथम काव्य संग्रह है l इसमें कुल पचास कविताएं शामिल हैं l ये सभी कविताएँ विभिन्न विषयों के प्रति विभिन्न मनोभावों को अपने में समाहित किए हुए हैं । कवि के जीवन का एक-एक अनुभूत क्षण इन कविताओं में झलकता है l कविताओं की भाषा कलिष्ट  बोझिल नहीं, बल्कि सरल है, इतनी सरल है कि आम से लेकर खास तक किसी भी स्तर के पाठक को पढ़ने में कोई मुश्किल नहीं आएगी । कवि ने सीधे- सीधे आम बोलचाल की ज़ुबान में अपनी बात कह देने में महारत हासिल है l बिना किसी अतिरिक्त प्रयास या लाग लपेट के अपनी बात कह कर आगे निकल जाने का चमत्कार अनकहे जज़्बातमें यत्र तत्र सर्वत्र दिखाई देता है । यह काव्य संग्रह महक रहा है । पृष्ठ-पृष्ठ पर एक अनोखी सुगंध विद्यमान नज़र आती है l सुंदर शब्द पुष्पों से गुंफित हार है ...... अनकहे जज़्बात l

      इस काव्य संग्रह की शुरुआत श्री सिद्धिविनायक स्तुति से हुई है l “हे ! वाग्वादिनी माँ  कविता में माँ सरस्वती से ज्ञान और ध्यान की प्राप्ति की प्रार्थना की गई है । अविद्या से छूटकारा पाने और ज्ञान की प्राप्ति के लिए कवि आह्वान करता है कि -  

आकर हमें विद्या का वरदान दे

हे! वाग्वादिनी माँ

हे! वाग्वादिनी माँ

तू हमें ज्ञान दे

तू हमें ध्यान दे …”

 बेड़ी का दर्दनारी के अंतर्मन की पीड़ा व उसकी भावनात्मक स्थिति को व्यक्त करती एक बेहतरीन कविता है । अपनी इस कविता के माध्यम से कवि  कहता है कि किस्मत में जो बंधन हैं, वे हमें दूरी पार नहीं करने देते। जीवन की परिस्थितियाँ और किस्मत की बंदिशें हमें बांधित करती हैं । बेड़ी का दर्दकविता इसी चिंता को कुछ यूँ जाहिर कर रही है:-

कहीं  दूर गगन में निकल जाऊं

पर पड़ी पाँव में जो बरसों से

किस्मत की बेड़ी,

कैसे तोड़ इसे उड़ जाऊं  l”

इस काव्य संग्रह की दोस्तीकविता सन्देश देती है कि अच्छे दोस्त हमेशा दिल से और सच्चाई से दोस्ती निभाते रहते हैं । सच्चे दोस्तों को अपनी दोस्ती को जीवंत और मजबूत रखने के लिए हमेशा दिल से मिलना चाहिए और एक-दूसरे के साथ मस्ती करते रहना चाहिए:-

दोस्त  अपनी दोस्ती

दिल से  निभाते  रहना

कर-कर बातें मुझे

हमेशा हँसाते रहना..

कवि बचपन की नादानियों और मासूमियत को याद करता है और उसकी विहान खो जाने पर दुःखी होता है l वह उन सुंदर और मासूम पलों को याद कर रहा है, जो अब वहाँ नहीं हैं ,जहाँ बचपन गुजरा था:-

वो बचपन वो नादानियाँ

अब कहाँ  चली गई .. ?

घूमता फिरता  था जहाँ

वो हसीन वादियां भी

अब कहाँ  चली गई .. ?

मानवीय रिश्तों में विश्वास और समर्थन का होना बहुत महत्वपूर्ण होता है। इन रिश्तों में हम अपनी भावनाओं को साझा करते हैं, एक दूसरे के साथ जुड़े रहते हैं और समर्थन प्राप्त करते हैं। लेकिन दुःख  की बात यह है कि कई बार हमारे अपनों से धोखा मिल सकता है । "तेरा सहारा" कविता में अंतर्मन की इसी पीड़ा में कवि तन्हा चीखते हुए कह रहा है -

जब शहद से मीठे लोगों ने

बन विषधर मुझको डंसा

तो अपनों ने भी मुझसे

किनारा कर लिया….”

गुलाम आज़ादीकविता के माध्यम से  कवि हम भारतीयों की विघटनकारी मानसिकता पर  चोट करते हुए कहता है कि हम आज़ाद तो हो गए लेकिन अभी भी धर्म-जाति के मोहपाश से मुक्त नहीं हो पाए हैं l ऐसी आज़ादी किसी काम की नहीं । इस काव्य-संग्रह की चलना ही होगाकविता अंधेरे कोनों पर रोशनी डालती है । तृषाकविता में कवि गहरा संदेश देते हुए कहता है कि हमें अपनी भावनाओं और इच्छाओं को छिपाने की बजाय उन्हें समझने और साझा करने की जरूरत है । कवि ने अस्मिता की  तलाशकविता को संसार और समाज के प्रति अपने मन के गहरे प्रेम से रचा है । ज़िन्दगी  तेरा कोई पता नहींकविता जीवन की अनिश्चितता को व्यक्त करती है । मैं मुक्त हूँकविता हृदय की भावनाओं का सुंदर शब्दों में आकार लिए हुए है । कुछ अनकहाकविता में  एक अनकही खामोशी का जिक्र है,जो अंतर्मन में अपने अस्तित्व और पहचान की तलाश में बहुत चीखती है । अंतर्मन की पीड़ाकविता से ये ज़ाहिर हो जाता है की लफ़्ज़ों की जादूगिरी राजीव जी को आती है । नासूरकविता हृदय को बड़ी ही गहराई तक स्पर्श करती है । जीवन चक्रकविता में संवेदनात्मक धरातल पर जीवन का एक विस्तृत फ़लक उजागर होता है । नवीन जीवनकविता एक नई शुरुआत, एक नया जीवन और मानवता की सच्ची पहचान की खोज को उजागर करती है l "पिंजरे में बंद मानव" कविता अत्यंत गहरी और संवेदनशील भावनाओं को व्यक्त करती है। इस काव्य संग्रह की अन्य कविताओं जैसे कोई शिकवा नहीं, बेदर्द दुनिया, एक दर्द ,आज का आशिक, तेरा इंतजार, नई मोहब्बत, मेरा सफर, बदलता इश्क़ आदि सभी कविताओं में राजीव जी ने अपने जीवन के अनुभवों को उकेर दिया है l जीवन की सच्चाई और सरलता को उनकी कविताओं में महसूस किया जा सकता है ।अधिकतर कविताएं ऐसी हैं कि यदि उन्हें बार-बार पढ़ा जाए तो उनके नए-नए अर्थ खुलते जाते हैं ।

यह काव्य-संग्रह राजीव जी का पहला प्रयास है l इस संग्रह में बहुत सी रचनाएं उम्दा हुई हैं, जिनका कोई जवाब नहीं है । फिर भी, राजीव जी को साहित्यिक जगत में अगर एक विशेष स्थान हासिल करना है तो उन्हें अपनी ये साधना मुसलसल जारी रखनी होगी क्योंकि साहित्यिक जगत को राजीव जी से बहुत अपेक्षाएं हैं l कवि को भी इस बात का आभास है l तभी तो कवि कह रहा है :- 

आसमाँ को अपने हौसलों से,

थरथराना अभी बाकी है…..!

राजीव जी का सृजन-कर्म अनवरत आयुष्मती उपलब्धियों का वरण करे l मेरी हार्दिक शुभकामनाएं !                                   

डॉ. नीरज पखरोलवी

गॉंव:- पखरोल, डाकघर  सेरा, तहसील:- नादौन,

जिला  हमीरपुर  (हि. प्र.)-177038  

06 March 2024

पुस्तक 'लाडो' की समीक्षा

March 06, 2024 0
साझा काव्य संग्रह 'लाडो' की समीक्षा ।  समीक्षक प्रो रणजोध  सिंह। संपादन रौशन जसवाल।                 लाडो हमारे घरों की आन-बान और शान 


लाडो शब्द का ध्यान करने मात्र से ही हृदय रोमांचित हो जाता है| आंखों के सामने दौड़ने लगती हैं एक छोटी सी परी, अठखेलियाँ, शरारत या मान-मनुहार करती हुई, जिसकी हर क्रिया से केवल प्रेम झलकता है और जिसे इस जगत के लोग बेटी, परी, या लाडो कहकर पुकारते हैं| 
विवेच्य काव्य संग्रह लाडो विश्व की आधी जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करने वाली बेटी को ही समर्पित है| साहित्य जगत के उज्ज्वल नक्षत्र श्री रौशन जसवाल 'विक्षिप्त' जो हिमाचल प्रदेश उच्चतर शिक्षा विभाग से संयुक्त निदेशक के पद से सेवानिवृत हुए है, ने इस भाव युक्त कविता संग्रह लाडो का संपादन किया है| इससे पहले भी वे, 'अम्मा जो कहती थी,' 'पगडंडियां,' 'मां जो कहती थी' और 'प्रेम पथ के पथिक' नाम की साझा संग्रहों का संपादन कर चुके है| 160 पृष्ठों के कलेवर में देश भर के 31 कवियों की लगभग 90 कविताओं को इसमें शामिल किया गया है|
इस काव्य संग्रह की बड़ी विशेषता यह है कि साहित्य जगत के नामी-गिरामी साहित्यकारों साथ-साथ उभरते हुए लेखकों को भी स्थान दिया गया है| पुस्तक का आरंभ हिमाचल प्रदेश के वरिष्ठ व प्रसिद्ध साहित्यकारों डॉ. प्रेमलाल गौतम 'शिक्षार्थी,' डॉ. शंकर वासिष्ठ और श्री हरि सिंह तातेर की सारगर्भित टिप्पणियों से हुआ है, जिनमें वैदिक काल से लेकर आज तक नारी जीवन का समस्त इतिहास व गरिमा समाहित है| इस काव्य संग्रह को पढ़कर कहना पड़ेगा कि बेटियां हमारे घरों की आन-बान और शान हैं| बेटियां हैं तो घर, परिवार और समाज है अन्यथा सब कुछ अधुरा है| आज की बेटी ने अपने को हर क्षेत्र में साबित किया है| अनिल शर्मा नील ने इसी बात का अनुमोदन करते हुए लिखा है:
गृहस्थी हो या फिर हो कार्यालय/ अपनी कुशलता से चमकया नाम है|/ नभ जल थल में लोहा मनवाया है/ लहरा के तिरंगा देश का बढ़ाया मान है|
बेटी तो एक ऐसा पारस है जो लोहे को भी चंदन बना देती है वह जिस जगह पर भी अपने कदम रखती है, वह जगह स्वर्ग सी सुंदर बन जाती है| वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. अशोक विश्वामित्र की इन पंक्तियां पर गोर फरमाएं: 
प्रीति, आस्तिकता सुरुचि, शुचिता, सुमति अमृत कनी,/ भाव निर्झरणी बही और एक हो बेटी बनी|/ पुष्प सी सुरभित, सुकोमल,/ स्नेह स्निग्धा त्याग और तप की धनी,/ भावना के गुच्छ ये सब एक हो बेटी बनी|
युवा कवि अतुल कुमार लिखते हैं: 
मुझे घमंड है/ मैंने एक बेटी को है पाया,/ पिता होने का सम्मान/ उसी ने मुझे दिलाया|
वरिष्ठ साहित्यकार एवं संस्कृत भाषा के विशारद डॉ. प्रेमलाल गौतम 'शिक्षार्थी' ने नारी को नवदुर्गा का रूप मानते हुए दो कुलों का प्रकाश लिखा है:
नवदुर्गा का प्रतीक आद्या/ दो कुलों का दीप आद्या| 
अपनी एक अन्य कविता 'सुकन्या' में उन्होंने नारी को सृष्टि की परम शक्ति बताते हुए देवी के नौ रूपों का बड़ा ही सुरुचि पूर्ण वर्णन किया है: 
'शैलपुत्री' आरोग्य दायिनी 'ब्रह्मचारिणी' सौभाग्य प्रदा, 
'चन्द्रघंटा' साहस सौम्यदा, मध्य कुष्मांडा करे धी विकास सदा| 
'स्कंदमाता' सुखशांति, कष्ट निवारणी 'कात्यानी' 
विकराल काल हरे 'कालरात्रि' 'महागौरी' पुण्यदायिनी| 
'सिद्धिदात्री' यह नवमी शक्ति, करती पूर्ण हर मनोकामना
नवदुर्गा आशीष साथ हो, नहीं होता भवरोग सामना|
वरिष्ठ साहित्यकार और यायावर श्री रत्नचंद निर्झर को लगता है कि बेटियां कभी मायके से जुदा नहीं होती: इसीलिए वह कहते हैं: 
मां ने अभी सहेज कर रखें/ बचपन के परिधान, गुड्डे गुडियां/ और ढेर सारे खिलौने/ बेटी की अनुपस्थिति में/ बतियाएगी उनके संग/ और करेगी उनसे/ बेटी जानकर एकालाप
वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. शंकर लाल वासिष्ठ ने उसे घर को सौभाग्यशाली कहा है जहां पर बेटी जन्म लेती है| बेटी सिर्फ पति के घर की शोभा नहीं अपितु वह अपना मायका भी अच्छे से संभालती है| उनकी एक कविता का अंश:
मायके की गरिमा तू/ ससुराल की अस्मिता है बेटी/ विचरती दो परिवारों में/ मान मर्यादा बनती है बेटी/ संभालती विचारती मुदितमना/ कर्तव्य निभाती है बेटी/ पावन, निष्कपट स्वाभिमान दो कुलों का है बेटी|
ये हमारे समाज की कितनी बड़ी बिडम्बना है कि एक तरफ तो हम बेटियों को देवी का दर्जा देते हैं मगर फिर भी हम उन्हें वो स्थान और वो सम्मान नहीं दे पायें हैं जिसकी वे हकदार हैं| लगभग प्रत्येक कवि ने बेटियों की वर्तमान स्तिथि पर चिंता व्यक्त की है| कन्या भ्रूण हत्या पर अपने भाव प्रकट करते हुए डॉ. कौशल्या ठाकुर कहती है:
चलाओ न निहत्थी पर हथियार/ लेने दो इसको गर्भनाल से पोषाहार| 
होने दो अंग प्रत्यंग विकसित,/ निद्रित कली को खोलने दो लोचन द्वार|
वरिष्ठ लेखक श्री हितेंद्र शर्मा ने अपने भाव कुछ इस तरह व्यक्त किये हैं: 
दहलीज लांघने से डरती है बेटियां/ पिया की प्रिया सखी बनती है बेटियां 
मां-बाप की तो सांसों की जान है बेटियां/ बाबुल की ऊंची पगड़ी की शान बेटियां 
खाली कानून बनाने से या बेटी के पक्ष में नारे लगाने से बात नहीं बनने वाली| निताली चित्रवंशी की कलम देखिए:
कानून बनने बदलने से/ सरकारों के आने जाने से/ उनकी बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियानों से कहाँ बच पा रही हैं बेटियां|   
यूं तो नारी के तीन रूपों की कल्पना की गई है लक्ष्मी, दुर्गा (शक्ति) और सरस्वती| मगर हमने नारी को सिर्फ पहले यानि लक्ष्मी रूप तक ही सीमित कर दिया है| चर्चित साहित्यकार डॉ. नरेंद्र शर्मा की पंक्तियां इसी बात का खुलासा कर रही हैं:
पुरुष प्रधान पितृसत्तात्मक समाज/ आदि शक्ति के/ तीन रूपों/आयामों/ लक्ष्मी, शक्ति और सरस्वती में से/ बेटियों को केवल/ घर की लक्ष्मी तक ही/ सीमित रखता है|
भारतीय समाज बेटियों को लेकर सदैव दोहरी मानसिकता रखता है| इस मर्म को समझा है युवा कवि राजीव डोगरा ने: 
हां मैं एक लड़की हूँ/ हां मैं वो ही लड़की हूँ/ जो अपनी हो तो/ चार दीवारी में कैद रखते हो|/ किसी और की हो तो/ चार दीवारी में भी/ नजरे गड़ाए रखते हो|
भारत, जिसे विश्वगुरु की संज्ञा दी जाती है, में आज कितना बुरा समय आ गया है कि आज की तिथि में बेटी का पिता होना एक खुशी की बात नहीं अपितु चिंता का विषय बन गया है| युवा कलमकार रविंद्र दत्त जोशी लिखते हैं:
हर पल चिंता की चिता में जीता हूँ
जी हाँ मैं भी एक बेटी का पिता हूँ| 
वरिष्ठ साहित्यकार एवं सेवा निवृत पुलिस अधीक्षक श्री सतीश रत्न अपनी चिंता व्यक्त करते हुये सवाल उठाते है कि बेटी को देवी का दर्जा देने वाले लोग असल जीवन में बिलकुल इसके विपरीत है| क्या हम उन्हें इतनी भी स्वंत्रता नहीं दे सकते कि वे निर्भय होकर घर से बाहर जा सके? उनकी एक कविता की बानगी देखिए:
बेटी, बाहर आदमी होंगे/ ज़रा संभल के जाना/ और हां/ दिन छिपने से पहले/ घर आ जाना!!
वही नीना शर्मा बेटियों का संरक्षण व संबल बनाने की बात करती हैं: 
बेटियां देश का भविष्य होती है अच्छे समाज का भार ढोती है/ परी बनाकर उन्हें नाजुक न बनाओ|
उधर देव दत्त शर्मा ने बेटियों को स्पष्ट हिदायत दी है कि अब रावण का अंत करने के लिए राम का इंतज़ार नहीं करना चाहिए| समय आ गया है जब उन्हें स्वयंसिद्धा होकर रावण का सामना करना होगा:
अब खुद ही सुताओं को प्रचंड धनुष उठाना होगा/ छोड़ लाज शर्म खुद को ही अब राम बनाना होगा|/ पहले भी लड़ी थी सती बनाकर यमराज से तू/ फिर तुझे ही अब धनुष संधान से रावण मिटाना होगा||
साहित्यकार श्री उदय वीर भरद्वाज पूरी पुस्तक में अकेले एक ऐसे कवि है जिन्होंने बेटी के सुखी वैवाहिक जीवन हेतु उसे नसीहत की कड़वी मगर सच्ची घुटी पिलाई है| उनकी निम्न पंक्तियों का विचारणीय हैं : काश/ लालच छोड़ सीखती संस्कार/ करती न अंतर/ मां-बाप सास ससुर में/ एक सा मानती/ मायका और ससुराल/ बेटी बेटी होती/ वृद्ध आश्रम न होते/ बेटी आदर्श
बहू होती/ बूढ़े मां-बाप/ स्वर्ग सुख भोगते/ बना रहता भाई बहनों में प्यार/ स्वर्ग से सुंदर होता संसार|
कुल मिलाकर इस कविता संग्रह में बेटी से संबंधित कोई ऐसा पहलू नहीं है जिस पर चर्चा नहीं की गई हो| संग्रह की अंतिम कविता 'बेटियां कभी उदास नहीं होती' इस संग्रह के संपादक श्री रौशन जसवाल 'विक्षिप्त' द्वारा लिखी गई है जिससे उन्होंने स्वयं भी यह स्वीकार किया है कि आज की परिस्थितियों में बेटियां सुरक्षित नहीं है| लेकिन वे आशावान है कि एक दिन ऐसा अवश्य आएगा जब यह संसार बेटियों की शक्ति को पहचानेगा और वे स्वतंत्रता व सम्मानपूर्वक अपना जीवन-यापन कर सकेगीं| 
एक ही विषय पर भिन्न कवियों पढ़ना न केवल मन को रोमांचित करता है अपितु उस विषय से संबंधित हर पहलू का सूक्ष्म विश्लेषण भी सहज ही हो जाता है| इस दृष्टि से लाडो एक सफल पुस्तक है और संग्रह करने योग्य हैं| मुझे पूर्ण विश्वास है कि कोई भी व्यक्ति जो इस संग्रह को दिल से पड़ेगा, बेटियों के प्रति निश्चित ही उसकी सोच बदलेगी और वह बेटी के सपनों में कभी बाधक नहीं बनेगा| मुख्य संपादक श्री जसवाल व उनकी संपादकीय टीम और संकलित लेखकों को बहुत-बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं| 

पुस्तक का नाम – लाडो कविताएं (साझा कविता-संग्रह) 
सम्पादक और प्रकाशक – रौशन जसवाल 'विक्षिप्त'
 300/- 
समीक्षक - रणजोध सिंह

25 February 2024

इस आदमी को बचाओ"

February 25, 2024 0

फेसबुक पर अशोक कुमार जी टिपण्णी 

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प्रिय कवि अजेय के इस संग्रह "इस आदमी को बचाओ" को आधार प्रकाशन से छपकर आये हुए लगभग एक वर्ष का समय होने को है।

कवि अजेय पर्वतीय संवेदनाओं के कवि हैं किंतु उनकी कविताओं में लाहुल का लोक ऐसे ही नहीं आता; वह आता है तीखे सवालों के साथ। उनकी कविताओं में पहाड़ सांस लेते हैं किंतु अंधुनिकता के अंधानुकरण के सामने तनकर खड़े होकर। नदिया बहती हैं; झरने गाते है किंतु अजेय की कविताएं उनके गान में बसी उन अव्यक्त पीड़ाओं को स्वर देती हैं जिन्हें आधुनिक होने के क्रम में हाशिए पर धकेल कर अनसुना करने की साजिशें रचने में लगे हैं पूंजी के पहरुए।

रोहतांग टनल बनते हुए कुछ चिंताएं यूं आती हैं:

"रूको दोस्त, सुनो -

यह जो छेद बनी है न

यहाँ तुम इस में यूँ दनदनाते हुए मत घुस जाना

कि हम जो वहाँ के पत्थर हैं

मिट्टी हैं, झरने हैं,

फूल पत्तियां और परिंदे हैं

और पेड़ हम अपनी जगह से उखड़ने न लग जाएं"

किंतु इस कवि को केवल आंचलिक अभव्यक्ति के साथ नत्थी कर देना इनके विस्तृत कविकर्म के साथ अन्याय होगा। इसलिए कवि अजेय को केवल पहाड़ी संवेदनाओं का कवि कहना उचित नहीं होगा। उनके कवित्व का फलक इतना बड़ा है कि वह समूचे विश्व की टीस को कुछ पंक्तियों में समेट लेने का हुनर रखते हैं:

"मेरा गाँव गज़ा पट्टी में सो रहा था

-------------------------

वह आकाश की ओर देखती थी

गाँव की छत पर लेटी एक छोटी बच्ची

दो हरी पत्तियों और एक नन्हे से लाल गुलाब की उम्मीद में जब कि एक बड़ा सा नीला मिज़ाईल

जिस पर बड़ा सा यहूदी सितारा बना है

गाँव के ठीक ऊपर आ कर गिरा है

जहाँ 'इरिगेशन' वालों का टैंक है (यह मेरा ही गाँव है) धमक से उस की पीठ के नीचे काँपती है धरती

(यह मेरी ही पीठ है)"

ये कवितायें अपने अतीत की टोह लेती हैं, वर्तमान की पीड़ाओं को अभिव्यक्त करती हैं और भविष्य की चिंताओं के साथ आपके ज़ेहन में जरूरी सवालात छोड़ जाती हैं:

"वहाँ कम्पनी दफ्तर के बाहर

इकट्ठे हो रहे हैं गांव के लोग

क्या ये विरोध करेगें ?

क्या ये विरोध कर पाएगें?"

तथाकथित विकास के साथ जो छोटी–छोटी चीजें हमारी संस्कृति पर अनायास ही हावी हो रहीं हैं उन्हें सूक्ष्मता से दर्ज करना अजेय बहुत बेहतरी से जानते हैं:

"मुद्दे ही मुद्दे हैं

और एन जी ओ ही एन जी ओ हैं

कल्चर का उत्थान हो रहा है

माँसाहारी देवी देवता वैष्णव हो रहे हैं

बकरों के सिर नारियल हो रहे हैं 

गूर और कारदार

वेद पढ़ रहे हैं संस्कृत हो रहे हैं

बोली का लहजा सपाट हो रहा है"

वैश्वीकरण के बाद मुनाफाखोरों ने जिस तरह विकास का नकाब ओढ़कर संसाधनों की लूट करने की इतनी सारी योजनाएं बनाई हैं, उन्हें समझने के लिए अजेय जी की कवितायें आपके मन में कोई खिड़की भले न खोलें किन्तु इतना सुराख तो कर ही देतीं हैं कि रौशनी की कोई किरण चुपचाप प्रवेश कर सके।

बदलती परिस्थितियों में जहां बेरोजगारी बढ़ी है रोजगार के अवसर कम हुए हैं तो माइग्रेशन भी बढ़ा है। इस समस्या को अलग एंगल से देख रहे हैं अजेय।

"बड़े सस्ते में तीन बिहारी बच्चे ले के लौट रहा हूँ

बाल श्रमिक पुनर्वास केंद्र से

दो को ऑरचर्ड भेज रहा हूँ

एक को घरेलू काम सिखाऊँगा"

उनकी कविताएं छोटी पंक्तियों में बड़े और कठिन सवाल करती हैं। जैसे:

"पान सिगरेट के अड्डों पर पार्टी कार्यालय खुल गए हैं"

"वर्ण व्यवस्था और राष्ट्र में से पहले किस बचाना है समझ नहीं आ रहा है"

अजेय की कविताओं में यदि अंधाधुनिकता की चिंता है तो प्रेम से पगी संवेदनाएं भी हैं जो आपको आपके अतीत में ले जाकर भीतर से गुदगुदा देती हैं।

"सुन लड़की!

चौथी जमात में

मेरे बस्ते से पाँच खूबसूरत कंकरों के साथ

एक गुलाबी रिबन और दो भूरी आँखें गुम हो गईं थीं

कहीं गलती से तेरी जेब में तो नहीं आ गई"

इस संग्रह में कविताओं पर कविता है, कवियों पर कविता है, विमर्शों पर राजनीति पर और विमर्शों की राजनीति पर भी कविताएं हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें आदमी को बचाने की कविता है।

बेहतरीन संकलन के लिए आधार प्रकाशन और अजेय भाई को हार्दिक बधाई।

–अशोक कुमार

22 February 2024

पुस्तक समीक्षा काव्य संग्रह--चिराग

February 22, 2024 0

*  पुस्तक समीक्षा   काव्य संग्रह--चिराग *  लेखक-शिव सन्याल   * समीक्षा *  गोपाल शर्मा * 

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एक इंजीनियर के मन मस्तिष्क से जब कविता जन्म लेती है तो मानवता में प्रकाश फैलाने के लिए चिरागस्वयमेव प्रजवलित हो जाते हैं। ऐसा ही कुछ शिव सन्याल जी ने किया है। देवभूमि हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिला की ज्वाली तहसील के गांव मकड़ाहन के सन्याल बंधु साहित्य के क्षेत्र में किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। शिव सन्याल कविसम्मेलनों की शान और जान हैं।शिव सन्याल जी की कविता जितनी सशक्त होती है उतनी ही शानदार इनकी प्रस्तुति होती है।

     प्रस्तुत काव्य संग्रह चिरागशिव सन्याल जी की हिन्दी कविताओं का सुंदर गुलदस्ता है। गुरु वंदना से शुरू हो कर कई प्रकार के भावों को अपने में समेटता हुआ, विविध रसों का आस्वादन कराता हुआ संसार को एक मेला बता कर काव्य संग्रह की इतिश्री कर देता है।गुरु वंदना में शब्दों से अधिक भावना का महत्व है।

        गुरु  सानिध्य  प्यार  का, मिटे  कष्ट  अपार।

        गुरु आशीष जिसे मिले,मन का मिटे विकार।

देवधरा हिमाचल का गुणगान भी बहुत ही सुंदर शब्दों में किया गया है। 


         देवदार  चील के  पेड़ हैं, लम्बे  ऊंचे सुंदर  विशाल।

        हरियाली से है हराभरा, हिमाचल देवभूमि का भाल।

 अपने प्यारे वतन हिंदुस्तान की प्रशंसा में भी कवि ने खूबसूरत शब्दों का चयन कर के कविता की रचना की है।जिसकी दो पंक्तियों को आपके साथ सांझा करने का मोह नहीं त्याग पा रहा हूँ।

 मैं सत्य अहिंसा का पुजारी, धर्मों का मान सम्मान हूँ।

हिन्दू, मुस्लिम, सिख, इसाई  का प्यारा हिंदुस्तान हूँ।

 कविता के माध्यम से स्वतंत्रता संग्राम के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की गई है। पिता के प्रति कृतज्ञता भाव भी बहुत शानदार शब्दों में व्यक्त किया गया है। बेटियों पर लिखी कविता के माध्यम से भ्रूणहत्या का विचार रखने वाले लोगों को फटकार लगाकर कवि ने कवि धर्म का निर्वाह किया है।

 हो विपदा के  घने अंधेरे, बेटी मुस्कान  से  मोहती है।

जिस घर में बेटी नहीं होती, ममता घुट घुट के रोती है।

 शिव सन्याल जी की कविताओं में कहीं राजनीति के गिरते स्तर पर चोट है, कहीं कर्म की महत्ता का गुणगान है तो कहीं समाज के गिरते नैतिक स्तर पर सशक्त प्रहार है।

 दुनिया साथी लाभ की, जब तक धन है पास।

चिपके  रहते  जोंक  से, बन के  रिश्ते  खास।

 अधुनिकता के नाम पर हो रहे नैतिक पतन का चित्रण कवि ने बड़ी सफलता से किया है।

 बिक गई है आज मर्यादा, बेशर्मी के बाजार में।

अधुनिकता अब छा गई है, हर नर और नार में।

 खेलने खाने और पढ़ने की उम्र में बच्चे को जब मजबूरी में मजदूरी करनी पड़ती है तो उसकी मन स्थिति को कवि ने खूबसूरत पंक्तियों में पिरोकर समाज के मुंह पर तमाचा मारने जैसा कार्य किया है।

 बढ़ते उछल कूद मस्ती में, मारें मस्ती में किलकार।

मेरा  मन भीतर  है रोता, जाऊं प ढ़ने मैं  इसबार।

 अंतिम कविता में कवि ने इस संसार को मिथ्या तथा क्षणभंगुर बता कर मानव को मोह माया से बच कर स्वयं को सदकर्मों में लगाने की प्रेरणा दी है।

 मोह माया के पंछी, कितना यहां ठिकाना है।

छोड़ बंधन यह सारे, चले इक दिन जाना है।

 अपने परिवेश में व्याप्त घटनाओं, स्थितियों, परिस्थितियों का अवलोकन ही शिव सन्याल जी की कविताओं का कथ्य है।इन कविताओं के माध्यम से कवि ने अपने दृष्टिकोण को पाठकों के सम्मुख रखा है। समाज में व्याप्त कुरीतियों पर चोट है।स्वतंत्रता सैनानियों को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की है, तथा युवाओं में देशप्रेम की भावना जागृत करने का उद्योग किया है। काव्य में भाषा से अधिक भावों का महत्व होता है। अतःचिरागकाव्य संग्रह के लिए शिव सन्याल जी को हार्दिक बधाई। मां सरस्वती का आशीर्वाद सदैव आप पर बना रहे।

                                                                                             गोपाल शर्मा,   21,जय मार्कीट   कांगड़ा, हि.प्र.।

09 February 2024

दुनिया के होने की आवाज़

February 09, 2024 0

फेसबुक पर अशोक कुमार जी समीक्षा



 "दुनिया के होने की आवाज़" आधार प्रकाशन से आया कवि प्रदीप सैनी का पहला काव्य संग्रह है। ऑनलाइन पोर्टल्स और पत्र-पत्रिकाओं में समय-समय पर छपने वाले प्रदीप सैनी फिलहाल किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं।


जब मैं यह लिख रहा हूँ तो प्रदीप सैनी की कविताओं के विशुद्ध पाठक की तरह लिख रहा हूँ। प्रदीप सैनी मेरी नज़र में "आसान भाषा के मुश्किल कवि हैं।" कारण यह कि प्रदीप सैनी की कवितायें अपने अर्थ में खुलने के लिए कई-कई पुनर्पाठों की मांग करतीं हैं।


कविता देखिए:


"यात्राएँ प्यास से पैदा होती हैं

दरअस्ल वे पानी की तलाश हैं


हर प्यास का अपना पानी होता है

यात्रा पर निकलते हुए साथ लिया गया पानी

ज़्यादा देर काम नहीं आता।"


हम हमेशा सुनते आए हैं कि सीधे-सीधे सपाट तरीके से ही यदि बात कहनी है तो कविता से बेहतर गद्य में कही जा सकती है। कविता हमेशा सांकेतिक होती है, इस बात को प्रदीप सैनी न केवल बहुत बेहतर तरीके से समझते हैं बल्कि इसे आत्मसात भी करते हैं। वे कहते हैं:


"उस कवि को संदेह से देखना चाहिए

जिससे बहुत आवाज़ आती हो

और उन कविताओं को भी

जिनसे कोई आवाज़ न आती हो।"


ऑनलाइन प्लेटफार्मज़ और सोशल मीडिया पर कभी- कभार प्रदीप सैनी को पढ़ना मुझे हमेशा से ही उनकी कविताओं के प्रति आकर्षित करता रहा है। कभी- कभार इसलिए लिख रहा हूँ कि प्रदीप खुद कहते है कि वह बहुत कम कविता लिख पाते हैं। वह कहते हैं:


"कभी-कभी आत्मा में धंसी सिर्फ एक पंक्ति कहने को लिखता हूँ पूरी कविता"


शोशल मीडिया के दौर में फेसबुक पर एक-एक कवि के द्वारा रोज़ की कइयों कवितायें लिखकर पोस्ट किए जाने के दौर में प्रदीप सैनी के द्वारा कम लिखे जाने का कारण आप उनकी कविता पढ़कर ही जान सकते हैं। वे चार्ल्स बुकोस्कि की इस बात पर गहरे से आचरण करते हुए दिखाई देते हैं कि "अगर फूट के ना निकले/

बिना किसी वजह के/मत लिखो"।


प्रदीप सैनी की कवितायें समकालीन परिदृश्य को दर्ज करती हुई संवेदनहीन होते जा रहे समय की शिनाख्त करती हुई सवालों को एक फ़ांस की तरह वक्त के गले में छोड़ जाती हैं ताकि आने वाली पीढियां जब कविता की यह किताब खोलें तो इस वक्त को चिह्नने में कोई मुश्किल न हो।


कोरोनकाल के समय मजदूरों के पैदल पलायन पर लिखी कविता "उनके तलुओं में दुनिया का मानचित्र है" पूरी सभ्यता पर शालीनता से सवाल उठाती हुई निशब्द कर देती है। कविता देखिए:-


"हमारी सभ्यताओं का स्थापत्य उनके पसीने से जन्मा है

हमारी रोशनियों में चमकता लाल

उनके लहू का रंग है

कोई चौराहा उन्हें दिशाभ्रमित नहीं करता

वे जानते हैं कौन-सा है शहर से बाहर जाने का रास्ता


वे नहीं पूछेंगे हमसे

कौन-सी सड़क जाती है उनके गाँव

उन्हें याद हैं लौट जाने के सभी रास्ते


उनके तलुओं में दुनिया का मानचित्र है।"


कवि नागार्जुन को याद करते हुए प्रदीप लिखते हैं कि:


"सौ झूठ जीता हूँ

शुक्र है इतना कि कविता में सिर्फ़ सच लिखता हूँ


धूल भरे मौसमों में

मैली हुई आत्मा को धोने

कविता में लौटता हूँ बार-बार

हर बार गंदला करता हूँ उसका जल


बाबा, ये मैं कैसा कवि हूँ?"


उनकी कविताओं से गुजरने पे ऐसा लगता है कि ये ड्राफ्ट-दर-ड्राफ्ट सुधारी गई कवितायें नहीं बल्कि एक ही बार में फूट पड़ी वे संवेदनाएं हैं जिन्हें कागज़ पर यूँ का यूँ रख दिया गया है। इसलिए कहीं-कहीं शब्दों का आधिक्य तो नहीं किन्तु हल्की-फुल्की अड़चन दिख सकती है उच्चारण करते समय।


इन कविताओं से होते हुए हम एक ऐसे संसार में प्रवेश करते हैं जिसे केवल प्रदीप ही रच सकते हैं। जहां वह "आज़ाद औरतें" कविता लिखकर स्त्री मन को पढ़ते हुई छुपी हुई पितृसत्ता के ऊपर से एक झटके से चादर खींचकर एकदम उघाड़ देते हैं।


तिब्बती लड़की और बौद्ध भिक्षु से उनका संवाद कुछ गहरे प्रश्न छोड़ता है मस्तिष्क में। इन कविताओं के बहाने वह धर्म, धर्म की राजनीति, निर्वासन के दर्द और विद्रोह के प्रश्नों पर वो सवाल पूछते हैं जिन्हें कभी भुलाया नहीं जाना चाहिए था किंतु इतने सालों में शायद सभी भूलने लगे हैं धीरे-धीरे।


कविताओं से गुजरते आप कवि प्रदीप सैनी में, अपने समय को लेकर एक सजग व्यक्ति, वैश्विक विस्थापनों के प्रति संवेदनशील अध्येता और प्रेम में प्रेम से अधिक कुछ नहीं खोजने वाले एक अनकंडीशनल प्रेमी को पाएंगे।


"यह पिछली सदी के

उम्मीद भरे आखिरी दिनों की बात है

सदी बदलने से तो यूँ बदलने वाला कुछ नहीं था

पर तुम अचानक मिली जब मुझे

यकीन हो चला था

आने वाले समय में बेहतर होगी दुनिया

विलुप्त हुई नदियाँ

दन्तकथाओं से निकल धरती पर बहेंगी

बारूद सिर्फ दियासलाई बनाने के काम आएगा

और ऐसे ही न जाने कितने सपनों ने

आँखों में घोंसला बना लिया था

मैं साफ-साफ नहीं देख पाता था वक़्त।"


प्रदीप भाई आप यूँ ही रचते रहिए। फिलहाल आपको पहले संग्रह की बधाई और भविष्य के लिए हार्दिक शुभकामनाएं।


-अशोक कुमार