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26 June 2024

पहाड़ों से जड़ों की तरह लिपटे कवि का संग्रह " देवदार रहंगे मौन" -- प्रकाश बादल

June 26, 2024 0

मेरे भीतर समाए कवि मोहन साहिल की कविता पर... खामखा की बात... मोहन साहिल..... जिसने मुझे खुद से दूर कर दिया....  


इन दिनों शिमला के रिज मैदान पर साहित्य का एक मेला लगा हुआ है | जहाँ पर ठियोग के एक महत्वपूर्ण कवि मोहन साहिल के दूसरे काव्य संग्रह ‘देवदार रहेंगे मौन’ का लोकार्पण हुआ, अपनी बात वहीं से शुरू करना चाहता हूँ | एक ठेठ पहाडी की पहचान लिए सादे कपड़ों में एक ढाबे पर चाय बनाने वाला कवि कितनी मीठी-मीठी कवितायेँ लिखता है यह उसकी कविताएँ पढ़कर अहसास हो जाता है| मैं मोहन साहिल की बात कर रहा हूँ| इतनी मिठास और इतनी अंतरंगता इसलिए आती है कि मोहन साहिल शिमला के ऊपरी पहाडी क्षेत्र में रहने वाले उन विरले व्यक्तियों में हैं, जो हर पल हर घड़ी पहाड़ों से लिपटा रहता है| उसका हर दिन पहाड़ों के बीचों बीच से होकर बहने वाले नदियों नालों और खड्डों से वार्तालाप करके शुरू होता है | उसका शिमला के ऊंचे टीले पर बसे ठियोग के शाली बाज़ार में चलने वाला लकी टी स्टाल और उसी टी स्टाल में बनने वाली देश की सबसे मीठी चाय.. सबसे मीठी इसीलिए है कि भेखलटी से ठियोग तक दस किलोमीटर का सफ़र करते समय, रात को अपने घर की छोटी खिड़की से झांकते समय, सुबह के पहले सूरज के उगते समय, बर्फ के गिरते और पिघलते समय पहाड़ से रोज़ मिठास बटोर  अपनी चाय में घोल देता है।|  मोहन की कविताएं अहसास कराती हैं कि पहाड़ों की ढलानदार घासनियों में चढ़ती उतरती पहाड़नों के पाँव की बिवाई में पगडंडियों की खुशबू और दोपहर को घास काटती पहाड़नों के लिए दोपहर का खाना लेकर आए पति जब उनके मेहंदी रंगे हाथों से काँटा और शरीर से कुम्बर निकालते हैं तो पहाड़नों के जीवन से मानो दुखों के कुम्बर निकाल रहे हों | पहाड़ को देखने के लिए मोहन साहिल की कविता सबसे बेहतर चश्मा है | मोहन साहिल की कविता पढ़ना ज़रूरी इसलिए है कि पहाड़ की चिंता और पहाड़ का दर्द इन्हें पढ़ कर साफ़ देखा जा सकता है | यदि पहाड़ों पर कचरा करने वाला सैलानी, पहाड़ों को बचाने वाला कोई इंजीनीयर, या फिर पहाड़ों के लिए चिंतित कोई नेता यदि मोहन साहिल की कविता पढ़ ले तो पहाड़ के बचे रहने के लिए एक मास्टर प्लान तैयार हो सकता है | मोहन साहिल एक बेहतरीन आर्किटेक्ट है जो पहाड़ पर तरक्की के भवन बनाने का विरोध नहीं करता,बल्कि  पहाड़ के दर्द से अनभिज्ञता की वकालत करता  है, जिसने पहाड़ को अपने भीतर समेट लिया है | मोहन साहिल की कविता महत्वपूर्ण क्यों हो जाती है ? उनकी कविता की ये पंक्तियाँ बयान करती हैं |

“ हम हैं जिन्होंने कविता के लिए

 नहीं चुने कठिन और अलंकारी शब्द

जीने के लिए चुने दुरूह और खाईदार रास्ते” 


मोहन साहिल का चश्मा जब तरह-तरह की कारों को पहाड़ों की घुमावदार सड़कों से होकर शहर की खुली सड़कों की ओर आते देखता है तो पूरे देश की तस्वीर सामने आने लगती है. यही एक सफल कवि का परिचय है | उनकी ‘कारें’ शीर्षक की कविता पढ़कर पूरे देश की व्यवस्था का भ्रमण किया जा सकता है |  उनकी कविता कहती है कि  कोई कार जन्म से घमंडी नहीं होती और शो रूम में भी शालीन नज़र आती हैं बल्कि कार में मंत्री के बैठते ही उसकी त्यौरियां चढ़ जाती हैं | इस कार को सड़कों पर पसरा दर्द, पैदल स्कूल जाते बच्चे, बसों की घंटों प्रतीक्षा करते ग्रामीण नज़र नहीं आते और यह कार सीधी एसकॉट के इशारे पर आगे निकल जाती है | एक अफसर की कार मंत्री की पिछलग्गू होते हुए भी ये खासियत रखती है कि हर साल मुरम्मत में ही लाखों खा जाती है| कारें कविता में डाक्टर से स्कूल मास्टर  तक की कारों को अगर आप मोहन साहिल की नज़रों से देखेंगे तो गंभीरता से लबालब  और आनद के ठहाकों से लोटपोट होकर निकलेंगे | पुलिस की कार सबको शक की निगाह से देखती नज़र आती है तो पाप की कमाई वाली कारों में एक्टर, ठेकेदार, गुंडे और बाहुबलि बैठे दिखाई देते हैं और ये कारें हमेशा नशे में धुत्त दिखाई देती हैं | मोहन साहिल की कविता बर्फ में सेल्फी खींचते पर्यटक भी दिखाई देते हैं तो वो हमें इसी बर्फ में भूखे प्यासे  बर्फ की ठण्ड से माँ की गोद में दुबके भूखे बच्चों तक ले जाती है, जिसका चित्र शायद कोई खींच न पाया हो | इसी संग्रह की कविता से पता चलता है कि जिन पहाड़ों की चोटियों पर लोग नंगे पाँव जाकर पूजा करते थे वहां आज लोग मूत कर आ जाते हैं| यह पहाड़ों के प्रति नई पीढी का एक पीडादायक पक्ष दिखाता है |  यह चित्र  मोहन साहिल की कविता से होकर ही देखा जा सकता है कि पहाड़ों पर जब बर्फ के तूफ़ान आते हैं तो देवता भी अपने आलीशान मंदिर के ऊपर वाली मंजिलों में जा बैठते हैं और तूफ़ान के थम जाने पर ही नीचे उतरते हैं, ऐसे में पहाड़ के लोगों को खुद कठिनाइयों से दो चार होना पड़ता है | पहाड़ का जीवन मोहन साहिल की कविता से बेहतर कोई नहीं जान सकता, यहाँ गृहणियां सोने चांदी के किसी गहने को नहीं, रस्सी को अपना जेवर समझकर कमर में पहनती हैं | पहाड़ पर रहने वाले अधिकतर बच्चे बिना जन्म पत्री के होते हैं जिनका भाग्य  मेहनत के पसीने में घुलता हुआ देखा आ सकता है | ठियोग में आलू की बिक्री के लिए बना आलू मैदान अब शाराबियों का अड्डा और कारों की पार्किंग बन गया है जहाँ लोग आलू का स्वाद और आलू  की किस्में भूल गए हैं, जिससे ठियोग के घरों में चूल्हा जलता है | नेपाल से आए मजदूर दिल बहादुर के ज़रिये कहा गया है कि एक मजदूर  नेपाल जाकर हर बार  इतना खून लेकर आ जाता है कि पहाड़ों के बागों में सेब का रंग लाल हो जाता है | सेब की कमाई से अमीर हुए लोगों के बच्चे अब सरकारी स्कूलों की टाट पर बैठ कर शिक्षा नहीं लेते बल्कि अंग्रेज़ी प्रवाह वाले स्कूलों में पढ़ते हैं और इन अंग्रेज़ी स्कूलों का रास्ता दिल बहादुर से हो कर ही निकलता है |  साहिल एक सम्वेदंशील कवि है, जिसे साफ़-साफ़ दिखाई देता है कि सेब के पौधे से पैसे कमाने वाला बागवान अमीर तो बेशक हो जाता है, लेकिन सेब के पौधे से रिश्ता नहीं जोड़ पाता | उधर दिल बहादुर के गाँव चले जाने पर सेब के पौधे मुरझाए रहते हैं, उसके लौट आने तक | मोहन साहिल की कविता में गमलों में खिले फूलों की खुशबू नहीं बल्कि जंगल के थपेड़े सहते जंगली फूल की खुशबू दिखाई देती है | मां और नगाल की कलमों के विरह में एक संवेदनशील कवि  पीड़ित दिखाई पड़ता है | मोहन साहिल की कविता के कैनवास में पहाड़ ही नहीं वो सब कुछ है, जो उन्होंने खुद जीया है,उन्होंने अपने भीतर की लाईब्रेरी से बाहर को महसूस किया है.. मसलन वो सिर्फ पहाड़ों तक सीमित नहीं रहते उनकी नज़रें जोश से भरे मीडिया के खरीदे जाने और सम्मोहित किये जाने पर भी पडती है, जहाँ मीडिया  की रगों में भ्रष्ट राजनीति एक ऐसा नशा भर दिया जाता है कि मीडिया भ्रष्टाचार की शरणस्थली बन जाता है | मोहन की कविता में सेब के बूढ़े पेड़ भी हैं और गाँव के बो बूढ़े भी जो इन्हीं बूढ़े पेड़ों से लिपट कर अपना दुःख बयान करते हैं|  कई गायब होते फल सव्ज़ियों के नाम चमड़े के जूते को कुर्म का जूता पुकारा जाना अतीत के बचे रहने की एक हल्की सी आशा है भड्डू, भटूरू,लाफी,कावणी आदि शब्द भी ताज़ा हो जाते हैं | जहां गोलियों से भुने जा रहे बच्चे, बमों से चीथड़ा हो रहे लोगों की खबरे हैं, वहीं मोहन साहिल की कविता में  चीटियों के पत्तों के बीच दबकर मर जाने का  शोक भी दर्ज है | बेकुसूर मंदिरों में काटे जाने वाले मेमनों की मिमियाहट बेशक देवता को नहीं सुनाई देती हो लेकिन कवि मोहन साहिल अक्सर इसे सुनते हैं| ‘देवदार रहेंगे मौन’ में पहाड़ की हरियाली को कैमरे में भर कर ले जाते पर्यटक भी हैं, तो तपस्या में लीन देवदार भी, जो सदियों से सबकुछ देखते आए हैं, सहते आए हैं | पहाडन के  हाथों की बिवाइयां दर्द से ज़्यादा कर्त्तव्य निभाने की मिठास महसूस करती हुई देखना, मोहन साहिल जैसे संवेदनशील कबिके ही बस की बात है | मोहन साहिल पर्यटकों को सलाह देते हुए भी दिखाई देते हैं की पहाड़ का निर्जीव चित्र खींचने भर से पहाड़ को देखना संभव नहीं कि भीतर एक अच्छा दिन  भी उबल रहा है | पहाड़ पर आपदा में नेताओं की हवाई यात्राओं के दौरान ज़मीन पर चीखते चिल्लाते लोगों को देखने वाला उड़नखटोला खरीदने की औकात किसी सकरार या नेता की नहीं, यह सिर्फ मोहन साहिल जैसे शिल्पी की ही जायदाद है | मोहन साहिल की कविता में बर्फ सूखे पहाड़ पर सपने बोने का काम करती हुई दिखाई देती है, पहाड़ पर फ़ैली धुंध में जब कुछ नहीं दिखाई देता तब भी मोहन की कविता पहाड़ के दर्द को साफ़ साफ़ देखती है | युद्ध को मनोरंजन बना देने की बात करने वाला कवि इस बात के लिए ज्यादा चिंतित है कि युद्ध में बच्चों के चीथड़े उड़ा देना भी अपराध नहीं | पगडण्डी और सडक को परिभाषित करती कविता कहती है की सड़क और पगडंडी में एक बड़ा अंतर ये है की सड़क में आदमी कहीं भी कुचला जा सकता है जबकि पगडंडी उंगली पकड़ घर तक ले जाती है | किसी उत्सव में नाचते हुए लोगों को देखकर कवि मोहन साहिल कहता है कि यह नाच देखकर ऐसा लगता है मानो सब समस्याएँ हल हो गईं हैं  | उनकी कविता में पाप नए ज़माने का फैशन है, जिसे लोग रात को सोते समय अपने बैडरूम में पसरे  बड़े चाव से टीवी पर देखते नज़र आते हैं | जवानी की नदी को अंधी दौड़ न लगाने की सलाह भी दी गयी है | मोहन की कविता चिड़ियों की उदासी में भी शरीक है|  उनकी कवितायेँ कहती हैं कि पढने के लिए किताबों के अलावा भी बहुत कुछ है, जैसे कतारबद्ध धारें, झुर्रियों वाले चेहरे, पत्थर जैसे हाथ, मिट्टी जैसे पाँव और घिसे हाथों की धुंधली लकीरे | उनकी कविता में ऐसे लोग भी हैं जो बचपन जवानी और जाड़े में अपने हिस्से की धूप अपने बच्चों के नाम कर अपना सारा जीवन कारखानों, खदानों, बंकरों और खेतों में गुज़ार देते हैं, ऐसे लोगों को सूरज भी नहीं पहचानता | मोहन साहिल विरले कवि इसलिए भी हैं कि वो महंगी गाड़ी में स्कूल जाते, हड्डियों को मज़बूत करने के लिए निठल्ले छत पर बैठे अमीरजादों के बच्चों को सभी सुविधाओं के लैस होते हुए भी उदास देखते हैं और तितलियों, मिट्टी पत्थर से खेलते गरीब बच्चों की अथाह खुशी से आनंदित होते हैं | उनके संग्रह से पहाड़ को साफ़ साफ़ देखा जा सकता है और पहाड़ से जीवन, उनकी कविता सोशल मीडिया पर लाखों फोलोवर वाले लोग नहीं खेतों में काम करते लोगों को दिखाती है, वो देवदारों की तपस्या में खलल डालने वाले नाचघरों को लेकर चिंतित है |

 बाकी फिर कभी.... 


आपका 


खामखा...

25 February 2024

इस आदमी को बचाओ"

February 25, 2024 0

फेसबुक पर अशोक कुमार जी टिपण्णी 

_________________



प्रिय कवि अजेय के इस संग्रह "इस आदमी को बचाओ" को आधार प्रकाशन से छपकर आये हुए लगभग एक वर्ष का समय होने को है।

कवि अजेय पर्वतीय संवेदनाओं के कवि हैं किंतु उनकी कविताओं में लाहुल का लोक ऐसे ही नहीं आता; वह आता है तीखे सवालों के साथ। उनकी कविताओं में पहाड़ सांस लेते हैं किंतु अंधुनिकता के अंधानुकरण के सामने तनकर खड़े होकर। नदिया बहती हैं; झरने गाते है किंतु अजेय की कविताएं उनके गान में बसी उन अव्यक्त पीड़ाओं को स्वर देती हैं जिन्हें आधुनिक होने के क्रम में हाशिए पर धकेल कर अनसुना करने की साजिशें रचने में लगे हैं पूंजी के पहरुए।

रोहतांग टनल बनते हुए कुछ चिंताएं यूं आती हैं:

"रूको दोस्त, सुनो -

यह जो छेद बनी है न

यहाँ तुम इस में यूँ दनदनाते हुए मत घुस जाना

कि हम जो वहाँ के पत्थर हैं

मिट्टी हैं, झरने हैं,

फूल पत्तियां और परिंदे हैं

और पेड़ हम अपनी जगह से उखड़ने न लग जाएं"

किंतु इस कवि को केवल आंचलिक अभव्यक्ति के साथ नत्थी कर देना इनके विस्तृत कविकर्म के साथ अन्याय होगा। इसलिए कवि अजेय को केवल पहाड़ी संवेदनाओं का कवि कहना उचित नहीं होगा। उनके कवित्व का फलक इतना बड़ा है कि वह समूचे विश्व की टीस को कुछ पंक्तियों में समेट लेने का हुनर रखते हैं:

"मेरा गाँव गज़ा पट्टी में सो रहा था

-------------------------

वह आकाश की ओर देखती थी

गाँव की छत पर लेटी एक छोटी बच्ची

दो हरी पत्तियों और एक नन्हे से लाल गुलाब की उम्मीद में जब कि एक बड़ा सा नीला मिज़ाईल

जिस पर बड़ा सा यहूदी सितारा बना है

गाँव के ठीक ऊपर आ कर गिरा है

जहाँ 'इरिगेशन' वालों का टैंक है (यह मेरा ही गाँव है) धमक से उस की पीठ के नीचे काँपती है धरती

(यह मेरी ही पीठ है)"

ये कवितायें अपने अतीत की टोह लेती हैं, वर्तमान की पीड़ाओं को अभिव्यक्त करती हैं और भविष्य की चिंताओं के साथ आपके ज़ेहन में जरूरी सवालात छोड़ जाती हैं:

"वहाँ कम्पनी दफ्तर के बाहर

इकट्ठे हो रहे हैं गांव के लोग

क्या ये विरोध करेगें ?

क्या ये विरोध कर पाएगें?"

तथाकथित विकास के साथ जो छोटी–छोटी चीजें हमारी संस्कृति पर अनायास ही हावी हो रहीं हैं उन्हें सूक्ष्मता से दर्ज करना अजेय बहुत बेहतरी से जानते हैं:

"मुद्दे ही मुद्दे हैं

और एन जी ओ ही एन जी ओ हैं

कल्चर का उत्थान हो रहा है

माँसाहारी देवी देवता वैष्णव हो रहे हैं

बकरों के सिर नारियल हो रहे हैं 

गूर और कारदार

वेद पढ़ रहे हैं संस्कृत हो रहे हैं

बोली का लहजा सपाट हो रहा है"

वैश्वीकरण के बाद मुनाफाखोरों ने जिस तरह विकास का नकाब ओढ़कर संसाधनों की लूट करने की इतनी सारी योजनाएं बनाई हैं, उन्हें समझने के लिए अजेय जी की कवितायें आपके मन में कोई खिड़की भले न खोलें किन्तु इतना सुराख तो कर ही देतीं हैं कि रौशनी की कोई किरण चुपचाप प्रवेश कर सके।

बदलती परिस्थितियों में जहां बेरोजगारी बढ़ी है रोजगार के अवसर कम हुए हैं तो माइग्रेशन भी बढ़ा है। इस समस्या को अलग एंगल से देख रहे हैं अजेय।

"बड़े सस्ते में तीन बिहारी बच्चे ले के लौट रहा हूँ

बाल श्रमिक पुनर्वास केंद्र से

दो को ऑरचर्ड भेज रहा हूँ

एक को घरेलू काम सिखाऊँगा"

उनकी कविताएं छोटी पंक्तियों में बड़े और कठिन सवाल करती हैं। जैसे:

"पान सिगरेट के अड्डों पर पार्टी कार्यालय खुल गए हैं"

"वर्ण व्यवस्था और राष्ट्र में से पहले किस बचाना है समझ नहीं आ रहा है"

अजेय की कविताओं में यदि अंधाधुनिकता की चिंता है तो प्रेम से पगी संवेदनाएं भी हैं जो आपको आपके अतीत में ले जाकर भीतर से गुदगुदा देती हैं।

"सुन लड़की!

चौथी जमात में

मेरे बस्ते से पाँच खूबसूरत कंकरों के साथ

एक गुलाबी रिबन और दो भूरी आँखें गुम हो गईं थीं

कहीं गलती से तेरी जेब में तो नहीं आ गई"

इस संग्रह में कविताओं पर कविता है, कवियों पर कविता है, विमर्शों पर राजनीति पर और विमर्शों की राजनीति पर भी कविताएं हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें आदमी को बचाने की कविता है।

बेहतरीन संकलन के लिए आधार प्रकाशन और अजेय भाई को हार्दिक बधाई।

–अशोक कुमार

22 February 2024

पुस्तक समीक्षा काव्य संग्रह--चिराग

February 22, 2024 0

*  पुस्तक समीक्षा   काव्य संग्रह--चिराग *  लेखक-शिव सन्याल   * समीक्षा *  गोपाल शर्मा * 

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एक इंजीनियर के मन मस्तिष्क से जब कविता जन्म लेती है तो मानवता में प्रकाश फैलाने के लिए चिरागस्वयमेव प्रजवलित हो जाते हैं। ऐसा ही कुछ शिव सन्याल जी ने किया है। देवभूमि हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिला की ज्वाली तहसील के गांव मकड़ाहन के सन्याल बंधु साहित्य के क्षेत्र में किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। शिव सन्याल कविसम्मेलनों की शान और जान हैं।शिव सन्याल जी की कविता जितनी सशक्त होती है उतनी ही शानदार इनकी प्रस्तुति होती है।

     प्रस्तुत काव्य संग्रह चिरागशिव सन्याल जी की हिन्दी कविताओं का सुंदर गुलदस्ता है। गुरु वंदना से शुरू हो कर कई प्रकार के भावों को अपने में समेटता हुआ, विविध रसों का आस्वादन कराता हुआ संसार को एक मेला बता कर काव्य संग्रह की इतिश्री कर देता है।गुरु वंदना में शब्दों से अधिक भावना का महत्व है।

        गुरु  सानिध्य  प्यार  का, मिटे  कष्ट  अपार।

        गुरु आशीष जिसे मिले,मन का मिटे विकार।

देवधरा हिमाचल का गुणगान भी बहुत ही सुंदर शब्दों में किया गया है। 


         देवदार  चील के  पेड़ हैं, लम्बे  ऊंचे सुंदर  विशाल।

        हरियाली से है हराभरा, हिमाचल देवभूमि का भाल।

 अपने प्यारे वतन हिंदुस्तान की प्रशंसा में भी कवि ने खूबसूरत शब्दों का चयन कर के कविता की रचना की है।जिसकी दो पंक्तियों को आपके साथ सांझा करने का मोह नहीं त्याग पा रहा हूँ।

 मैं सत्य अहिंसा का पुजारी, धर्मों का मान सम्मान हूँ।

हिन्दू, मुस्लिम, सिख, इसाई  का प्यारा हिंदुस्तान हूँ।

 कविता के माध्यम से स्वतंत्रता संग्राम के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की गई है। पिता के प्रति कृतज्ञता भाव भी बहुत शानदार शब्दों में व्यक्त किया गया है। बेटियों पर लिखी कविता के माध्यम से भ्रूणहत्या का विचार रखने वाले लोगों को फटकार लगाकर कवि ने कवि धर्म का निर्वाह किया है।

 हो विपदा के  घने अंधेरे, बेटी मुस्कान  से  मोहती है।

जिस घर में बेटी नहीं होती, ममता घुट घुट के रोती है।

 शिव सन्याल जी की कविताओं में कहीं राजनीति के गिरते स्तर पर चोट है, कहीं कर्म की महत्ता का गुणगान है तो कहीं समाज के गिरते नैतिक स्तर पर सशक्त प्रहार है।

 दुनिया साथी लाभ की, जब तक धन है पास।

चिपके  रहते  जोंक  से, बन के  रिश्ते  खास।

 अधुनिकता के नाम पर हो रहे नैतिक पतन का चित्रण कवि ने बड़ी सफलता से किया है।

 बिक गई है आज मर्यादा, बेशर्मी के बाजार में।

अधुनिकता अब छा गई है, हर नर और नार में।

 खेलने खाने और पढ़ने की उम्र में बच्चे को जब मजबूरी में मजदूरी करनी पड़ती है तो उसकी मन स्थिति को कवि ने खूबसूरत पंक्तियों में पिरोकर समाज के मुंह पर तमाचा मारने जैसा कार्य किया है।

 बढ़ते उछल कूद मस्ती में, मारें मस्ती में किलकार।

मेरा  मन भीतर  है रोता, जाऊं प ढ़ने मैं  इसबार।

 अंतिम कविता में कवि ने इस संसार को मिथ्या तथा क्षणभंगुर बता कर मानव को मोह माया से बच कर स्वयं को सदकर्मों में लगाने की प्रेरणा दी है।

 मोह माया के पंछी, कितना यहां ठिकाना है।

छोड़ बंधन यह सारे, चले इक दिन जाना है।

 अपने परिवेश में व्याप्त घटनाओं, स्थितियों, परिस्थितियों का अवलोकन ही शिव सन्याल जी की कविताओं का कथ्य है।इन कविताओं के माध्यम से कवि ने अपने दृष्टिकोण को पाठकों के सम्मुख रखा है। समाज में व्याप्त कुरीतियों पर चोट है।स्वतंत्रता सैनानियों को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की है, तथा युवाओं में देशप्रेम की भावना जागृत करने का उद्योग किया है। काव्य में भाषा से अधिक भावों का महत्व होता है। अतःचिरागकाव्य संग्रह के लिए शिव सन्याल जी को हार्दिक बधाई। मां सरस्वती का आशीर्वाद सदैव आप पर बना रहे।

                                                                                             गोपाल शर्मा,   21,जय मार्कीट   कांगड़ा, हि.प्र.।

09 February 2024

दुनिया के होने की आवाज़

February 09, 2024 0

फेसबुक पर अशोक कुमार जी समीक्षा



 "दुनिया के होने की आवाज़" आधार प्रकाशन से आया कवि प्रदीप सैनी का पहला काव्य संग्रह है। ऑनलाइन पोर्टल्स और पत्र-पत्रिकाओं में समय-समय पर छपने वाले प्रदीप सैनी फिलहाल किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं।


जब मैं यह लिख रहा हूँ तो प्रदीप सैनी की कविताओं के विशुद्ध पाठक की तरह लिख रहा हूँ। प्रदीप सैनी मेरी नज़र में "आसान भाषा के मुश्किल कवि हैं।" कारण यह कि प्रदीप सैनी की कवितायें अपने अर्थ में खुलने के लिए कई-कई पुनर्पाठों की मांग करतीं हैं।


कविता देखिए:


"यात्राएँ प्यास से पैदा होती हैं

दरअस्ल वे पानी की तलाश हैं


हर प्यास का अपना पानी होता है

यात्रा पर निकलते हुए साथ लिया गया पानी

ज़्यादा देर काम नहीं आता।"


हम हमेशा सुनते आए हैं कि सीधे-सीधे सपाट तरीके से ही यदि बात कहनी है तो कविता से बेहतर गद्य में कही जा सकती है। कविता हमेशा सांकेतिक होती है, इस बात को प्रदीप सैनी न केवल बहुत बेहतर तरीके से समझते हैं बल्कि इसे आत्मसात भी करते हैं। वे कहते हैं:


"उस कवि को संदेह से देखना चाहिए

जिससे बहुत आवाज़ आती हो

और उन कविताओं को भी

जिनसे कोई आवाज़ न आती हो।"


ऑनलाइन प्लेटफार्मज़ और सोशल मीडिया पर कभी- कभार प्रदीप सैनी को पढ़ना मुझे हमेशा से ही उनकी कविताओं के प्रति आकर्षित करता रहा है। कभी- कभार इसलिए लिख रहा हूँ कि प्रदीप खुद कहते है कि वह बहुत कम कविता लिख पाते हैं। वह कहते हैं:


"कभी-कभी आत्मा में धंसी सिर्फ एक पंक्ति कहने को लिखता हूँ पूरी कविता"


शोशल मीडिया के दौर में फेसबुक पर एक-एक कवि के द्वारा रोज़ की कइयों कवितायें लिखकर पोस्ट किए जाने के दौर में प्रदीप सैनी के द्वारा कम लिखे जाने का कारण आप उनकी कविता पढ़कर ही जान सकते हैं। वे चार्ल्स बुकोस्कि की इस बात पर गहरे से आचरण करते हुए दिखाई देते हैं कि "अगर फूट के ना निकले/

बिना किसी वजह के/मत लिखो"।


प्रदीप सैनी की कवितायें समकालीन परिदृश्य को दर्ज करती हुई संवेदनहीन होते जा रहे समय की शिनाख्त करती हुई सवालों को एक फ़ांस की तरह वक्त के गले में छोड़ जाती हैं ताकि आने वाली पीढियां जब कविता की यह किताब खोलें तो इस वक्त को चिह्नने में कोई मुश्किल न हो।


कोरोनकाल के समय मजदूरों के पैदल पलायन पर लिखी कविता "उनके तलुओं में दुनिया का मानचित्र है" पूरी सभ्यता पर शालीनता से सवाल उठाती हुई निशब्द कर देती है। कविता देखिए:-


"हमारी सभ्यताओं का स्थापत्य उनके पसीने से जन्मा है

हमारी रोशनियों में चमकता लाल

उनके लहू का रंग है

कोई चौराहा उन्हें दिशाभ्रमित नहीं करता

वे जानते हैं कौन-सा है शहर से बाहर जाने का रास्ता


वे नहीं पूछेंगे हमसे

कौन-सी सड़क जाती है उनके गाँव

उन्हें याद हैं लौट जाने के सभी रास्ते


उनके तलुओं में दुनिया का मानचित्र है।"


कवि नागार्जुन को याद करते हुए प्रदीप लिखते हैं कि:


"सौ झूठ जीता हूँ

शुक्र है इतना कि कविता में सिर्फ़ सच लिखता हूँ


धूल भरे मौसमों में

मैली हुई आत्मा को धोने

कविता में लौटता हूँ बार-बार

हर बार गंदला करता हूँ उसका जल


बाबा, ये मैं कैसा कवि हूँ?"


उनकी कविताओं से गुजरने पे ऐसा लगता है कि ये ड्राफ्ट-दर-ड्राफ्ट सुधारी गई कवितायें नहीं बल्कि एक ही बार में फूट पड़ी वे संवेदनाएं हैं जिन्हें कागज़ पर यूँ का यूँ रख दिया गया है। इसलिए कहीं-कहीं शब्दों का आधिक्य तो नहीं किन्तु हल्की-फुल्की अड़चन दिख सकती है उच्चारण करते समय।


इन कविताओं से होते हुए हम एक ऐसे संसार में प्रवेश करते हैं जिसे केवल प्रदीप ही रच सकते हैं। जहां वह "आज़ाद औरतें" कविता लिखकर स्त्री मन को पढ़ते हुई छुपी हुई पितृसत्ता के ऊपर से एक झटके से चादर खींचकर एकदम उघाड़ देते हैं।


तिब्बती लड़की और बौद्ध भिक्षु से उनका संवाद कुछ गहरे प्रश्न छोड़ता है मस्तिष्क में। इन कविताओं के बहाने वह धर्म, धर्म की राजनीति, निर्वासन के दर्द और विद्रोह के प्रश्नों पर वो सवाल पूछते हैं जिन्हें कभी भुलाया नहीं जाना चाहिए था किंतु इतने सालों में शायद सभी भूलने लगे हैं धीरे-धीरे।


कविताओं से गुजरते आप कवि प्रदीप सैनी में, अपने समय को लेकर एक सजग व्यक्ति, वैश्विक विस्थापनों के प्रति संवेदनशील अध्येता और प्रेम में प्रेम से अधिक कुछ नहीं खोजने वाले एक अनकंडीशनल प्रेमी को पाएंगे।


"यह पिछली सदी के

उम्मीद भरे आखिरी दिनों की बात है

सदी बदलने से तो यूँ बदलने वाला कुछ नहीं था

पर तुम अचानक मिली जब मुझे

यकीन हो चला था

आने वाले समय में बेहतर होगी दुनिया

विलुप्त हुई नदियाँ

दन्तकथाओं से निकल धरती पर बहेंगी

बारूद सिर्फ दियासलाई बनाने के काम आएगा

और ऐसे ही न जाने कितने सपनों ने

आँखों में घोंसला बना लिया था

मैं साफ-साफ नहीं देख पाता था वक़्त।"


प्रदीप भाई आप यूँ ही रचते रहिए। फिलहाल आपको पहले संग्रह की बधाई और भविष्य के लिए हार्दिक शुभकामनाएं।


-अशोक कुमार

14 September 2023

डा. वासिष्ठ का तीसरे कविता संग्रह 'जुगनू जितनी औकात' का विमोचन

September 14, 2023 0

हिन्दी दिवस के पावन मौके पर प्रदेश के  उप मुख्यमंत्री श्री मुकेश अग्निहोत्री ने राज्य स्तरीय हिन्दी दिवस समारोह में सोलन के माने जाने साहित्यकार  डा.शंकर वासिष्ठ की पुस्तक "जुगनू जितनी औकात" का लोकार्पण किया।  वरिष्ठ साहित्यकार डा. शंकर वासिष्ठ का जुगनू जितनी औकात शीर्षक से तीसरा कविता संग्रह साहित्य संस्थान गाजियाबाद के सौजन्य से प्रकाशित हुआ है। डा. वासिष्ठ ने इस संग्रह में समाज की व्यथा-कथा और उसके कारणों को बड़े ही मर्मस्पर्शी शब्दों में उकेर कर जो रेखाचित्र खींचा है, वह आज की समस्त सोच को दर्पण की


भांति स्पष्ट ला कर रख देता है। सामाजिक-भौतिकतावादी सोच व निंदनीय प्रयास, राजनैतिक लिप्सा व लोकतांत्रिक सीमाओं का उल्लघन, इतना ही नहीं नेताओं की अपने सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रति उदासीनता, समाज की अधिकार सजगता व कर्त्तव्य विमुखता, स्वतंत्रता के नाम पर उच्छृंखलता को खूब दर्शाया और लताड़ा है। कोविड काल का मार्मिक चित्रण व पल्लू झाड़ने वालों की मानवता को चेताता है। धर्म के नाम पर मानवता का हनन व संकीर्ण चिंतन सोचने को

विवश कर देता है। सुभाष, परमार व त्यौहारों का सटीक चित्रण अतीत की समृद्धता को उजागर करता है। प्राकृतिक छटा को भी खूब निहारा और सौंदर्यपूर्ण शब्दों में संजोया है।