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16 May 2023

सुबकते पन्नों पर बहस : एक सार्थक संवाद

May 16, 2023 0

  कवि-आलोचक

डॉ. अनिल पांडेय ने सुबकते पन्नों पर बहस की कविताओं के माध्यम से समकालीन हिंदी
कविता पर जो आलोचनात्मक टिप्पणियां दी हैं वे सुबकते पन्नों पर बहस के कवि
  अनुज देवेंद्र धर के लिए तो निसंदेह उत्साहवर्धक होंगी ही -कविता के
मर्मज्ञ पाठकों के लिये भी लाभप्रद होंगी जो साहित्य के इस दमघोटू माहौल में
श्रेष्ठ कविताओं की तलाश करते रहते हैं। दिल की गहराइयों से आपका आभार डॉ अनिल
पांडेय ।



अपने
इस संवाद में कवि देवेंद्र धर की कविताओं पर
  टिप्पणी दर्ज करते हुए
डॉ. अनिल पांडेय कहते हैं:...ऐसी बहुत-सी कविताएँ हैं देवेन्द्र धर के पास जिनको
आप मजबूत कविताएँ कह सकते हैं...यह संग्रह अमूमन सुबकते पन्नों पर बहस जो शीर्षक
है उसको इतनी सार्थकता के साथ अभिव्यक्त करता है
, इतनी
सार्थकता के साथ मजबूती देता है कि आप कल्पना नहीं कर सकते
|" 



अनिल
पांडेय जी ने गांव अब लौट जा कविता से अपना संवाद प्रारंभ किया।संग्रह की एक सशक्त
कविता इंतज़ार पर भी
 
इस संवाद में चर्चा की है।कविता की अंतिम पंक्तियों- हम जानते
हैं/बीज हैं हम फिर उगेगें/बस मौसम और खाद का इंतजार है-पर अपनी प्रतिक्रिया
व्यक्त करते हुए आपने कहा है:"बस मौसम और खाद का इंतजार है और ये कि बीज हैं
हम फिर उगेंगे यह एक कविता की सबसे मजबूत सम्भावना है कि जो बार-बार दबाए कुचले
मारे जाने के बाद भी उग आने और अपनी उपस्थित दर्ज करवाने के लिए वह संकल्पित है और
प्रतिबद्ध
| एक और कविता मैं- वो गीत नहीं लिखूंगा- पर डॉ
पांडेय का महत्वपूर्ण व्यक्त है:



"...कवि जो कहना चाहता है या लिखना चाहता है वह मजबूती के साथ लाता है|
उसको लय से नहीं लेना देना, उसको तुकबंदियों
से नहीं लेना-देना और सच में जिसको आप लोकप्रिय कहते हैं...लोकप्रिय होना एक अलग
बात है...लोकहित में होना एक अलग बात है
| छंदबद्ध और
छंदमुक्त के बीच संघर्ष और लड़ाइयों की जो वजह है और लोकप्रियता और लोकहित की भी तो
लोकप्रिय कवि नहीं होना चाहता
| कवि अगर पर्दे के पीछे भी है
और अगर लोकहित में मजबूत अभिव्यक्ति दे रहा है लोकप्रिय ना भी हो तो उसे कोई
अपेक्षा नहीं है
| "



आपका
कवियों और प्रकाशकों को
 
निम्न संदेश वस्तुतः अत्यंत महत्वपूर्ण है:



"...प्रकाशक भी यदि अपनी ज़िम्मेदारी को ठीक से समझे और कवि...जो महानगरों तक
सीमित हो जा रहे हैं वह अगर गाँव में बढने और पहुँचने का ख्व़ाब पालें जैसे एक समय
बिसारती हुआ करते थे गाँव में जो चूड़ियाँ
, कंगन वगैरह बेचते
हैं
, अगर उस तरीके से ये कविता लेकर लोगों को सुनाने के लिए
निकले तो मैं यह दावे के साथ कह सकता हूँ कि ये ऐसी कविताएँ हैं जो एक मजबूत नींव
डाल सकती हैं परिवर्तन और बदलाव की ।



 परिवर्तन और बदलाव अचानक नहीं आते ये धीरे धीरे आते हैं, धीरे धीरे कार्य करते हैं धीरे धीरे लोगों की चेतना में प्रवेश करते हैं
और धीरे धीरे लोग अपने घरों और महलों को छोड़कर सडकों पर आते हैं
| यह शुरुआत भी कवियों को करना पड़ेगा| गीत ऐसा लिखना
पड़ेगा कि उससे आन्दोलन और क्रांति की आवाज़ आए
|"