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29 February 2024

"सूत्रधर" कविता संकलन

February 29, 2024 0
सूत्रधर    ओड़िया      कविता संकलन *   अनुवाद    पारमिता षड़ंगी         *      समीक्षा ईप्सिता षड़ंगी *  
 “सूत्रधर” पिताजी कवि डॉ. बंशीघर षड़ंगी की नवम कविता संकलन है।“सूत्रधर” के नाम करण से स्वत: भरत मुनि के नाट्यशास्त्र की याद आती है। भरत मुनि ने “नाट्य शास्त्र” के पैंतीसवें अध्याय में “सूत्रधर” का उल्लेख किया है। यह “सूत्रधर” नाटक अथवा “लोकबृत्ति” के निर्देशक है । “लोकबृत्ति” को भरत मुनि ने मनुष्य के जीवनचर्या की कलात्मक अनुकरण के रूप में दर्शाया है। “सूत्रधर” एक ऐसे ज्ञानदीप्त मनुष्य है जो मंच परिचालन के साथ साथ वाद्ययंत्र, गीत आदि में विशेष ज्ञान का अधिकारी हैं। और जब जीवनरूपी नाटक की बात आती है तो “सूत्रधर” वह है जो सबके जीवन के सूत्र को अपने हाथों में धारण करके उसे कठपुतली की तरह  नचाते हैं। यहाँ पिताजी के संकलन में “सूत्रधर” अदृश्य, सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी, परम दयालु भगवान की ओर संकेत कर रहा है। जो अपने नाटक में स्वयं ही सब कुछ है। वो सभी नियमों से ऊर्ध्व में है। किसी भी समय वह “रंग शीर्ष”(मंच) पर आ सकते है अथवा चाहे तो “अंगशीर्ष”( नेपथ्य गृह) में रह कर अपनी मर्जी से निर्देश दे सकते हैं। पिताजी के शब्द में –
  “सूत्रधर, तुम्हारे अभिधान में/ शब्दों के स्वतंत्र अर्थ होते है /उनके पास जाना या /निकटतर होना / हमारे लिए आसान नहीं है” [सूत्रधर (३)]
    उनके लिए कौन सा रास्ता निर्दिष्ट नहीं है। वह व्याकरण के राह पर चलकर प्रणव तक जा सकते हैं या इसके विपरित उनको ही मालूम । सत्यवती के साथ पराशर के संबंध से, व्यास के जन्म के माध्यम से ज्ञान का मार्ग हो अथवा बिना तत्व ज्ञान की शबरी का भक्ति का मार्ग हो, या कोई भी कवि, जो सब कुछ छोड़कर, खुद को ऊर्ध्व में उठाए उनके सामने समर्पण कर दें, हजारों दिशाओं में हजारों प्रकाश पुंज भेजना ,यह सबकुछ करने में समर्थ है वह “सूत्रधर”। सभी कला, सभी कविता, सभी कथ्य, अणकथ्य ,गम्य अगम्य के ऊर्ध्व में है ,यह “सूत्रधर” [ जो सारे नाट के गोवर्धन (फ़साद की जड़ )] के उपर पाँच कविताएँ और “शेष दृश्य” (1),(2) में  पिताजी इस महान नाटककार का वर्णन करते हुए लिखते हैं –
   (1)हमारे नाट्यकारों के ऊर्ध्व में / और एक नाट्यकार है /उसके नाटक में अजीब घटनाएँ घटती है /आवर्त्तक, संवर्त्तक, द्रोण और पुष्कर आदि,/ चतुर्मेघ  इकट्ठे बारिश करें तो भी/
पृथ्वी पर सूखा पड़ जाता है /शून्य महाशून्य में अपने आप मंदिर गढ़ जाता है /मगर उस मंदिर का /प्रवेश द्वार नहीं होता है।“ ( शेष दृश्य 1)
  (2) “नाविक हो या बरगद का पेड़/ या बेचारी राजकुमारी /किसी भी बात को हम /नाटक का आखिरी दृश्य है, ऐसा बोल नहीं सकते  ×××××/ सचराचर / अंतिम दृश्य जैसा /कुछ नहीं है। (शेष दृश्य 2)
      सिर्फ संकलन के नामकरण में ही नहीं, पिताजी की कविता प्राच्य काव्यतत्व और प्राच्य दर्शन का मंत्र पाठ करती हैं जो उनके काव्य दर्शन की वैशिष्ट्य हैं। उनके काव्य में अनेक छोटी-छोटी घटनाओं के अवतरण ऐसे हुए हैं, जो जीवन के बृहत्तर अर्थ की अन्वेषण की महान परम्परा को उज्जीवित कराती हैं। स्थान, काल, पात्र के बावजूद उनकी कविता जीवन की जिज्ञासाओं को व्यंजना करती है।
     संग्रह की कविताएँ मुख्य रूप से शून्यता में पूर्णता का अनुभव, निरवता तपस्या में , ध्यान के मार्ग से गूढ़ दर्शन को शब्दों में मूर्त्त करने का प्रयास करता है। और इतनी लाचारी के बीच काले अंधेरे में ईश्वर की उपस्थिति की उपलब्धि को साक्षात कराते हैं। यह सच है कि जीवन और जगत नश्वर  है, लेकिन कव्य-भाषा की चलत्-शक्ति तथा अनेक आख्यान के आगमन में वही नश्वरता, अलग राह पर चलते हुए एक अद्भुत लोक में ले जाती है, जहाँ सभी पीड़ाओं का एक ही उपसम है, सभी वियोगों के लिए मिलन की संभावना है। इस संभावनाओं का ऐश्वर्य ही पिताजी के काव्य की अनूठी विशेषता है। जैसे :-
    (1)”हमेशा कुछ कुछ बातों का समाधान में  देर होता है / कभी कभी अचानक राह / दिख जाती है कि/××××× आकस्मिकता हमेशा गुप्त में रहती है…(आने का वक्त)
    (2) मेरे पास आने वाला बुलवा / सीधा आ रहा है कि छद्म वेश में / एक वाक्य लिखते वक्त / बार-बार वही स्वर रोकने लगा है ××××मेरे नीरव मुहूर्त में / कोलाहल भरने के लिए” (कोलाहल )
   (3) साया के जैसा अनेकों बातों के / औद्धत्य को सहना पड़ता है / कभी कभी सुबह की हवा की /दुलारना में जीवन के उपर / यकीन आ जाता है / भरोसा आ जाता है ( राहगीर)
      ऐसी कई कविताएँ हैं जिनमें  भाषा खूब साधारण, परिचित और आत्मीय है। लेकिन भाव की गंभीरता शब्दों के माध्यम से जीवन की सच्चाई को व्यक्त करती है। चाहे वह उपमा हो या बिम्ब,  वहाँ  Allusion अथवा संकेत हो या न हो, एक परिचित जीवन-दृश्य संचरित होता है। जैसे:- 
    (1)पहाड़ के चारों तरफ से / साँप के तरह लपेटे हुए / उपर जाता है रास्ता / ऐसा लगता है मुझे / फिर से समुद्र मंथन के / तैयारी चल रही है शायद ,[नाव (1)]
     (2) “सूखा पहाड़ के उपर / चंद्र सूर्य अपने अपने वक्त पर / आराम से बैठ जाते हैं / और कभी कभी शाम को भी / लालटेन जला कर बातें करते “(पहड़)
     (3)“सूर्य के अस्त होते ही / सिंदुर दानी जैसी / बादल के डिब्बे से निकल आएगा चाँद / फिर धीरे धीरे सुहागिन की मांग से/ विधवा की सफेद साड़ी में / बदल जाएगा / अब लालटेन को धीमा करना पडेगा।“
[परिधि (१)]
    (4)“ओस में भीग कर हवा / जब पत्ते पर बैठ गया तो / कांप गया उसका पूरा बदन /जिंदगी है तो धूप बारिश सब / सहने के अलावा और कोई चारा नहीं,(जुहार)
       कई जाने-पहचाने चित्रों में पहली तीन पंक्तियों में अनेक अनुपम दृश्य हैं । चौथी पंक्ति में जीवन जैसा दृश्य वास्तविकता को बयान करती है। जीवन , अकेलेपन  और इस अकेलेपन से खुद के लिए, समाज के लिए एक महार्घ अनुभव को लेकर रचित इन कविताओं को यह संकलन धारण किया है।  इन कविताओं के शब्द सारे कम  चौंकाने वाले हैं मगर भाव के गहराइयों में ले जाने के लिए सदा जाग्रत है ।   
    पिताजी के अन्य कविता संकलन के तरह ,यह संकलन भी एक नई दिशा के तरफ संकेत कर , नया दृष्टिकोण के आलोक प्रदान करता है, जिसके जड़ ओड़िआ साहित्य की मूल परंपरा के साथ जुड़ा हुआ है। इन कविताओं में गोरख संहिता से लेकर बलराम दास के भजन , ”भाव समुद्र “जगन्नाथ दास के “भागवत”,”भजन”, शिशु अनंत दास के ”ज्ञान घर भजन”
, यशवंत दास के “भजन” , दैवज्ञ बिप्र के “टीका गोविंद चंद्र “,सालवेग के भजन , भक्त चरण दास के “मनबोध चउतिशा “, राधानाथ के “ चिलिका “ आदि अनेक कविताओं की प्रसंग और गूढ़ चेतना उल्लेख किया गया है। उनके कविताएं हमारे साहित्य की जड़ के साथ संयोजित होने के साथ साथ सांप्रतिक समय खंड को, एक अलग ढंग से प्रसारित करते हैं। साधारणतः कवि भीतर से बाहर के तरफ़ गमन करते हैं,मगर पिताजी  के कविताएं बाहर से भीतर के तरफ़ गति करते हुए अंत:स्थल को आलोकित करती है। इसलिए उनके कविताएं गभीर अनुभूति को ग्रहण करती है । इन कविताओं के शरीर मूलतः प्रकृति से संगठित अथवा निर्मित, जिसमें मानवीय द्वंद्व, ऋतुओं की तरह प्रज्वलित और निर्वापित होते रहते हैं एवं समस्त आवरण को छेद कर हरे पत्ते जैसे आस्था को उपर ले आते हैं। पिताजी इन कविताओं में बार-बार जिन स्मृतियों कि जंजीर में जकड़ जातें हैं, वह है बचपन के खेलकूद से , अचानक वर्तमान को संयोजित कर के । चेतना की धारा ( Stream of consciousness ) की यह तकनीक ओड़िआ कविता क्षेत्र में एक नूतन परिक्षण है, मुझे ऐसा लगता है। ऐसे ही कुछ पंक्तियों के उदाहरण है -:
(1) “चाँद उतर रहा है सागौन के पत्ते से/ केले के पत्तों को / वहीं से बिखर रहा है / उसी वक्त सारे बगीचे में  / नदी जैसी एक टुकड़ा आसमान में / वहीं चांद कश्ती बन तैर रही है / द्वैत भूमिका में  ×××××× हमें भी कोई / ऐसे ही कुछ / राह दिखा देते तो / हम अवतीर्ण हो सकते / सिर्फ द्वैत  नहीं / कई भूमिकाओं में” (भूमिका-1)
(2) “ वर्षा होने पर / आसमान में लकीरें खींच जाती / साफ़ दिखाई नहीं देता / पास में खड़े आदमी का चेहरा / ठीक उसी वक्त / अबोलकरा पंडित से प्रश्न करता है / चेहरा क्यों साफ़ दिखाई नहीं देता / बहुत दिनों से यही अबोलकरा / सिर्फ पंडित के पास नहीं / हमारे पास भी आ रहा है / शायद वह कोई और नहीं / हम खुद / तो फिर पंडित / पंडित भी हम ही हैं / हमेशा हम ही तो है यही / दोनों भुमिकाओं में” (भूमिका (2)
(3) “ दादाजी जाने के बाद पन-बट्टा खाली / ×××××× किसके आने के आहट पास होता जा रहा है /तब से चारों तरफ सन्नाटा / सच झूठ सचमुच आपेक्षिक” (सचझूठ)
(4) “ आकाश और पृथ्वी की / मिलने वाली जगह को / दिगंत कहते हैं / मगर दिग का क्या / कोई अंत होता है / उधर देखें तो सबकुछ / धुंधला सा दिखता है / ठीक हमारे जंजाल से भरा जीवन जैसा “(स्तुति)
   इस संकलन में अनेक कविताओं में सृजन रहस्य को लेकर कवि के जिज्ञासा दिखाई देता है। रहस्य के अंधकार में प्रवेश और उसके तत्व-भेद करने की निष्ठा अनेकों कविताओं में द्रष्टव्य । जैसे -: 
(1) “कभी कभी शब्दों के नदी में / बह जाता है कवि तो / कभी डूबते हुए शब्दों के समुद्र में / मगर किसी के पास तो सीढ़ी नहीं है / वोही शब्दों के कन्धों का / सहारा ले कर / कवि को तो उपर उठना पडेगा” (जन्मांतर)
(2) “काश ! हमे कोई बता देता /पहले से जानने के राह / आखिरकार कैसे कविता लिखना है / कौनसी साधना में चलते / हम पहूँच सकते अपने लक्ष्यस्थान में / सचमुच उस राह में चलना / क्या धारी तलवार पर चलने जैसा”
( कविता खाता)
(3) अक्षर को सजाकर कौन बिठाएगा / सच्चाई को बयाँ करना किसके जिम्मेदारी / वह तो भोग खा कर सो रहा है / उसका पहड़ उठाएगा कौन ?”(पहड़ )
(4) “कौन सी मुद्रा में आराधना करने से / ईश्वर संतुष्ट होते होंगे / पता लगाना पड़ेगा / कौन से शब्दों के अर्थों के ऊर्ध्व ध्वनि / और उससे ऊर्ध्व मंत्र के स्तर को / जानने के लिए / उनको आवाहन करना होगा” (प्रार्थना)
   इस संकलन में पैंसठ कविताएं हैं। शुरू “ बिनराह “ से हुई है और आखिरी कविता “हाट” है ।
      “शेष दृश्य (2)” में पिताजी कहा है कि, “हर बातों का शुरुआत तो है / शायद आखि़र नहीं / हमारे आँखो को जो अंतिम / दिखाई देता है / वास्तव में वह अंत नहीं / आगे और भी आगे कई सारे बातें / छुपी हुई होती है ×××× हमारे आँखो को अंतिम पड़ाव जैसा / दिखाई देते हुए भी / सचमुच वह अंत नहीं होता है / सचराचर / अंतिम दृश्य जैसा / कुछ नहीं है।“ – इसलिए शेष न होने वाला प्रक्रिया का विराम कहाँ है ?
    अपनी भाव के लिए शब्द ढूंढने वाले कवि हमेशा बेबस होतें है। एक उम्रदराज कवि को भी शब्दों को, अपने भाव के साथ जुगलबंदी कराने के लिए तपस्या करनी पड़ती है । ऐसे ही अनेक भावओं को लेकर यह संकलन समृद्ध। जैसे कहा गया है -: “कभी कभी अपने शव को / लहू के नदी में बहना पड़ता है / एक शब्द के लिए एक अर्थ के लिए / असहाय अवस्था को सामना करना पड़ता है /  तभी शायद कोई मिल जाए / जो लिखवा दे / आपने आप को / हो सके एक माध्यम जैसे / अपनाया जा सकता है / किसी एक कवि को” (बूढा होने के बाद)
      सारे कवियों को एक माध्यम के रूप में ग्रहण कर के समय के श्यामपट्ट (ब्लैकबोर्ड) में खुद को लेखक जाहिर करने वाला लीलामय “सूत्रधर” , सभी कवियों के परीक्षा लेते रहते हैं।
   “ सूत्रधर” संकलन पाठकों के द्वारा खूब आदृत हो।

"सम्बित के पास जब मैं नहीं थी" (कहानी संग्रह)

February 29, 2024 0

 *  पुस्तक समीक्षा    "सम्बित के पास जब मैं नहीं थी"    (कहानी संग्रह)  *  पारमिता  षडंगीं‌   

समीक्षा *   प्रदीप बिहारी    बेगूसराय (बिहार)  * 

संवेदना को छूती कहानियां


पारमिता षडंगीं‌ की मातृभाषा ओड़िआ है। वह ओडिआ के अतिरिक्त हिंदी भी जानती हैं। हिंदी भी उतना ही जानती है, जितना ओड़िआ । मतलब, ओड़िआ और हिंदी पर समान अधिकार रखती हैं। दोनों भाषाओं के गद्य-पद्य में रचनाशील हैं। साथ ही, एक सजग अनुवादक भी हैं।
उनकी तेरह मौलिक हिंदी कहानियों का यह संग्रह पाठकों के समक्ष आ रहा है, जो एक सुखद बात है। इस संग्रह में संग्रहित कहानियाँ पाठकों के ईर्द-गिर्द की कहानी लग सकती है और इसी कारण पाठकों की प्रिय कहानियाँ भी बन सकती हैं। इन कहानियों की प्रस्तुति में यह दम दिखता है।
         कहानी में कथावस्तु की नवीनता और विश्वसनीयता के साथ-साथ कहानी कहने का ढंग भी महत्वपूर्ण होता है। कुछ बातें यथा, कहानी में वर्णित परिवेश, कहानी की भाषा, कथ्य के अनुसार परिवेश एवं कथा-पात्रों का चयन एवं प्रतिस्थापन आदि पर लेखक जितना अधिक काम करता है, कहानी उतनी विश्वसनीय बन पाती है। इस संग्रह की कहानियों से गुजरते हुए कहानियों की विश्वसनीयता पर आपको किसी प्रकार का शक नहीं होगा।
          इस संग्रह की कहानियों में, जैसा मैंने ऊपर कहा है कि पाठकों के ईर्द-गिर्द की कथावस्तु को प्रस्तुत किया गया है। ये कहानियाँ जीवन के यथार्थ का बखान करती हैं, और इतनी सहजता से बखान करती हैं कि पाठकों के मन में अपनी जगह बना लेती हैं। पाठकों को लगता है कि ये उनकी ही कहानी है, मात्र उन्हीं की। जो कहानियाँ पाठकों के मन में यह बोध उत्पन्न कर देती हैं, सफल कहानियों की श्रेणी में होती हैं। यह बोध उत्पन्न करने में इस संग्रह की कहानियाँ भी सफल हुई हैं।
            कहानियों में विभिन्न विमर्शों की बात का चलन भी पिछले कुछ दशकों से चर्चा में रहा है। इस दृष्टिकोण से अगर देखा जाय तो इस संग्रह में स्त्री और वृद्ध विमर्श की कहानियाँ आनुपातिक रूप में अधिक हैं। यह सत्य है कि आज के समाज में स्त्री और वृद्धों को अपेक्षित सम्मान नहीं मिल पा रहा है। ऐसी स्थिति में एक सजग लेखक का दायित्व बन जाता है कि उनके जीवन के राग-विराग को अपनी कहानियों का विषय बनाएं।
          इस संग्रह की एक कहानी ‘नीड़’ की चर्चा करना चाहूंगा कि इस कहानी का पारायण करते हुए आप पाएंगे कि यह कहानी कई विमर्शों का संगम है। स्त्री और वृद्ध विमर्श के साथ-साथ यह कहानी पर्यावरण विमर्श के लिए भी आमंत्रित करती है। छल-कपट, धूर्तता और अर्थ के बल पर किए जा रहे अत्याचार को भी इस कहानी में दर्शाया गया है। इस कहानी की शिल्पगत खासियत यह है कि पूरी कहानी का सूत्रधार पेड़ पर रह रहे तोता-मैना को बनाया गया है। पक्षियों के माध्यम से आदमी की व्यथा-कथा और संवेदना को इस कहानी में उकेर कर पारमिता ने अभिनव कार्य किया है।
          इसी तरह ‘निःसंगता के स्वर’ कहानी में भी एक सेना के अवकाशप्राप्त, पर विधुर अधिकारी की व्यथा कही गई है, जिसके बच्चे विदेश में रहते हैं और मूल घर को प्लेटफॉर्म की तरह समझना भी भूल गए हैं। उस अधिकारी के घर में चोर घुस गया है। दोनों में संवाद होता है। सिर्फ दो पात्रों की इस कहानी का ट्रीटमेंट पाठक को बखूबी बांधता है। यह कहानी तो पढ़ते ही बनती है।
           इस संग्रह में एक कहानी मिलेगी –‘संबित मिश्र के पास जब मैं ‌नहीं थी’। यह विशुद्ध प्रेमकथा है। क्लासरूम, हॉस्टल और कैरियर से गुजरते हुए यह कहानी पाठकों को शाश्वत प्रेम का दिग्दर्शन करा‌ सकती है।
          इस संग्रह में संग्रहित पारमिता जी की कहानियां ग्रामीण और नागर बोध की हैं। मेरी यह बात कहानियों को पढ़ने के बाद आपको थोड़ा अटपटा लग सकती है, कारण पूरे गांव की कहानी प्रायः आपको नहीं दिख सकती है। पर, पारमिता के लेखन का कौशल कह लें या परिपक्वता, नागर बोध की कहानियों में वह ग्रामीण परिवेश को कुशलता से समेट लेती है। और इस संग्रह की कुछ कहानियों में आप पारमिता षड़ंगी के इस कौशल को देख पाएंगे।
         आज के विषम बुद्धि विरोधी माहौल में अगर किसी चीज का क्षरण हो रहा है, तो वह है- संवेदना। संवेदना का क्षरण ही मानवीय मूल्यबोध को हाशिए से भी हटाने पर तुला है। ऐसे समय में संवेदना और मानवता को बचाए रखने का संघर्ष एक सजग लेखक का दायित्व बन जाता है। उपरोक्त कहानियों के साथ पारमिता षडंगी ने अपनी अन्य कहानियाँ यथा- ‘शून्य ईलाका’, ‘मकड़ी का जाल’, ‘काल्पनिक’, ‘पत्थर में बदलनेवाली’, ‘वो, मैं और दो घंटो का आलाप’, ‘मां, बीनू और बिल्ली’, ‘हमसफर’,‘खजाना’, ‘अनदेखा घाव’ कहानियों के माध्यम से संवेदना और मानवता को बचाए रखने के संघर्ष में अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज किया है। लगे हाथ यह भी बता दूं कि इन कहानियों के शिल्प भी आपको परम्परागत शिल्पों से अलग लगेगी ।
      मैं पारमिता षड़ंगी का अभिनन्दन करता हूँ। साथ ही, शुभकामनाएँ भी देता हूँ। इन कहानियों को पढ़ने के बाद तय है कि पाठकों को उनके कथाकार से उम्मीदें बढ़ जाएंगी। पर, मैं आश्वस्त हूँ कि पारमिता‌ पाठकों के उम्मीद पर खड़ी उतरेंगी।
    शुभकामनाओं के साथ।
   प्रदीप बिहारी 
 बेगूसराय (बिहार)

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25 February 2024

इस आदमी को बचाओ"

February 25, 2024 0

फेसबुक पर अशोक कुमार जी टिपण्णी 

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प्रिय कवि अजेय के इस संग्रह "इस आदमी को बचाओ" को आधार प्रकाशन से छपकर आये हुए लगभग एक वर्ष का समय होने को है।

कवि अजेय पर्वतीय संवेदनाओं के कवि हैं किंतु उनकी कविताओं में लाहुल का लोक ऐसे ही नहीं आता; वह आता है तीखे सवालों के साथ। उनकी कविताओं में पहाड़ सांस लेते हैं किंतु अंधुनिकता के अंधानुकरण के सामने तनकर खड़े होकर। नदिया बहती हैं; झरने गाते है किंतु अजेय की कविताएं उनके गान में बसी उन अव्यक्त पीड़ाओं को स्वर देती हैं जिन्हें आधुनिक होने के क्रम में हाशिए पर धकेल कर अनसुना करने की साजिशें रचने में लगे हैं पूंजी के पहरुए।

रोहतांग टनल बनते हुए कुछ चिंताएं यूं आती हैं:

"रूको दोस्त, सुनो -

यह जो छेद बनी है न

यहाँ तुम इस में यूँ दनदनाते हुए मत घुस जाना

कि हम जो वहाँ के पत्थर हैं

मिट्टी हैं, झरने हैं,

फूल पत्तियां और परिंदे हैं

और पेड़ हम अपनी जगह से उखड़ने न लग जाएं"

किंतु इस कवि को केवल आंचलिक अभव्यक्ति के साथ नत्थी कर देना इनके विस्तृत कविकर्म के साथ अन्याय होगा। इसलिए कवि अजेय को केवल पहाड़ी संवेदनाओं का कवि कहना उचित नहीं होगा। उनके कवित्व का फलक इतना बड़ा है कि वह समूचे विश्व की टीस को कुछ पंक्तियों में समेट लेने का हुनर रखते हैं:

"मेरा गाँव गज़ा पट्टी में सो रहा था

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वह आकाश की ओर देखती थी

गाँव की छत पर लेटी एक छोटी बच्ची

दो हरी पत्तियों और एक नन्हे से लाल गुलाब की उम्मीद में जब कि एक बड़ा सा नीला मिज़ाईल

जिस पर बड़ा सा यहूदी सितारा बना है

गाँव के ठीक ऊपर आ कर गिरा है

जहाँ 'इरिगेशन' वालों का टैंक है (यह मेरा ही गाँव है) धमक से उस की पीठ के नीचे काँपती है धरती

(यह मेरी ही पीठ है)"

ये कवितायें अपने अतीत की टोह लेती हैं, वर्तमान की पीड़ाओं को अभिव्यक्त करती हैं और भविष्य की चिंताओं के साथ आपके ज़ेहन में जरूरी सवालात छोड़ जाती हैं:

"वहाँ कम्पनी दफ्तर के बाहर

इकट्ठे हो रहे हैं गांव के लोग

क्या ये विरोध करेगें ?

क्या ये विरोध कर पाएगें?"

तथाकथित विकास के साथ जो छोटी–छोटी चीजें हमारी संस्कृति पर अनायास ही हावी हो रहीं हैं उन्हें सूक्ष्मता से दर्ज करना अजेय बहुत बेहतरी से जानते हैं:

"मुद्दे ही मुद्दे हैं

और एन जी ओ ही एन जी ओ हैं

कल्चर का उत्थान हो रहा है

माँसाहारी देवी देवता वैष्णव हो रहे हैं

बकरों के सिर नारियल हो रहे हैं 

गूर और कारदार

वेद पढ़ रहे हैं संस्कृत हो रहे हैं

बोली का लहजा सपाट हो रहा है"

वैश्वीकरण के बाद मुनाफाखोरों ने जिस तरह विकास का नकाब ओढ़कर संसाधनों की लूट करने की इतनी सारी योजनाएं बनाई हैं, उन्हें समझने के लिए अजेय जी की कवितायें आपके मन में कोई खिड़की भले न खोलें किन्तु इतना सुराख तो कर ही देतीं हैं कि रौशनी की कोई किरण चुपचाप प्रवेश कर सके।

बदलती परिस्थितियों में जहां बेरोजगारी बढ़ी है रोजगार के अवसर कम हुए हैं तो माइग्रेशन भी बढ़ा है। इस समस्या को अलग एंगल से देख रहे हैं अजेय।

"बड़े सस्ते में तीन बिहारी बच्चे ले के लौट रहा हूँ

बाल श्रमिक पुनर्वास केंद्र से

दो को ऑरचर्ड भेज रहा हूँ

एक को घरेलू काम सिखाऊँगा"

उनकी कविताएं छोटी पंक्तियों में बड़े और कठिन सवाल करती हैं। जैसे:

"पान सिगरेट के अड्डों पर पार्टी कार्यालय खुल गए हैं"

"वर्ण व्यवस्था और राष्ट्र में से पहले किस बचाना है समझ नहीं आ रहा है"

अजेय की कविताओं में यदि अंधाधुनिकता की चिंता है तो प्रेम से पगी संवेदनाएं भी हैं जो आपको आपके अतीत में ले जाकर भीतर से गुदगुदा देती हैं।

"सुन लड़की!

चौथी जमात में

मेरे बस्ते से पाँच खूबसूरत कंकरों के साथ

एक गुलाबी रिबन और दो भूरी आँखें गुम हो गईं थीं

कहीं गलती से तेरी जेब में तो नहीं आ गई"

इस संग्रह में कविताओं पर कविता है, कवियों पर कविता है, विमर्शों पर राजनीति पर और विमर्शों की राजनीति पर भी कविताएं हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें आदमी को बचाने की कविता है।

बेहतरीन संकलन के लिए आधार प्रकाशन और अजेय भाई को हार्दिक बधाई।

–अशोक कुमार

22 February 2024

पुस्तक समीक्षा काव्य संग्रह--चिराग

February 22, 2024 0

*  पुस्तक समीक्षा   काव्य संग्रह--चिराग *  लेखक-शिव सन्याल   * समीक्षा *  गोपाल शर्मा * 

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एक इंजीनियर के मन मस्तिष्क से जब कविता जन्म लेती है तो मानवता में प्रकाश फैलाने के लिए चिरागस्वयमेव प्रजवलित हो जाते हैं। ऐसा ही कुछ शिव सन्याल जी ने किया है। देवभूमि हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिला की ज्वाली तहसील के गांव मकड़ाहन के सन्याल बंधु साहित्य के क्षेत्र में किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। शिव सन्याल कविसम्मेलनों की शान और जान हैं।शिव सन्याल जी की कविता जितनी सशक्त होती है उतनी ही शानदार इनकी प्रस्तुति होती है।

     प्रस्तुत काव्य संग्रह चिरागशिव सन्याल जी की हिन्दी कविताओं का सुंदर गुलदस्ता है। गुरु वंदना से शुरू हो कर कई प्रकार के भावों को अपने में समेटता हुआ, विविध रसों का आस्वादन कराता हुआ संसार को एक मेला बता कर काव्य संग्रह की इतिश्री कर देता है।गुरु वंदना में शब्दों से अधिक भावना का महत्व है।

        गुरु  सानिध्य  प्यार  का, मिटे  कष्ट  अपार।

        गुरु आशीष जिसे मिले,मन का मिटे विकार।

देवधरा हिमाचल का गुणगान भी बहुत ही सुंदर शब्दों में किया गया है। 


         देवदार  चील के  पेड़ हैं, लम्बे  ऊंचे सुंदर  विशाल।

        हरियाली से है हराभरा, हिमाचल देवभूमि का भाल।

 अपने प्यारे वतन हिंदुस्तान की प्रशंसा में भी कवि ने खूबसूरत शब्दों का चयन कर के कविता की रचना की है।जिसकी दो पंक्तियों को आपके साथ सांझा करने का मोह नहीं त्याग पा रहा हूँ।

 मैं सत्य अहिंसा का पुजारी, धर्मों का मान सम्मान हूँ।

हिन्दू, मुस्लिम, सिख, इसाई  का प्यारा हिंदुस्तान हूँ।

 कविता के माध्यम से स्वतंत्रता संग्राम के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की गई है। पिता के प्रति कृतज्ञता भाव भी बहुत शानदार शब्दों में व्यक्त किया गया है। बेटियों पर लिखी कविता के माध्यम से भ्रूणहत्या का विचार रखने वाले लोगों को फटकार लगाकर कवि ने कवि धर्म का निर्वाह किया है।

 हो विपदा के  घने अंधेरे, बेटी मुस्कान  से  मोहती है।

जिस घर में बेटी नहीं होती, ममता घुट घुट के रोती है।

 शिव सन्याल जी की कविताओं में कहीं राजनीति के गिरते स्तर पर चोट है, कहीं कर्म की महत्ता का गुणगान है तो कहीं समाज के गिरते नैतिक स्तर पर सशक्त प्रहार है।

 दुनिया साथी लाभ की, जब तक धन है पास।

चिपके  रहते  जोंक  से, बन के  रिश्ते  खास।

 अधुनिकता के नाम पर हो रहे नैतिक पतन का चित्रण कवि ने बड़ी सफलता से किया है।

 बिक गई है आज मर्यादा, बेशर्मी के बाजार में।

अधुनिकता अब छा गई है, हर नर और नार में।

 खेलने खाने और पढ़ने की उम्र में बच्चे को जब मजबूरी में मजदूरी करनी पड़ती है तो उसकी मन स्थिति को कवि ने खूबसूरत पंक्तियों में पिरोकर समाज के मुंह पर तमाचा मारने जैसा कार्य किया है।

 बढ़ते उछल कूद मस्ती में, मारें मस्ती में किलकार।

मेरा  मन भीतर  है रोता, जाऊं प ढ़ने मैं  इसबार।

 अंतिम कविता में कवि ने इस संसार को मिथ्या तथा क्षणभंगुर बता कर मानव को मोह माया से बच कर स्वयं को सदकर्मों में लगाने की प्रेरणा दी है।

 मोह माया के पंछी, कितना यहां ठिकाना है।

छोड़ बंधन यह सारे, चले इक दिन जाना है।

 अपने परिवेश में व्याप्त घटनाओं, स्थितियों, परिस्थितियों का अवलोकन ही शिव सन्याल जी की कविताओं का कथ्य है।इन कविताओं के माध्यम से कवि ने अपने दृष्टिकोण को पाठकों के सम्मुख रखा है। समाज में व्याप्त कुरीतियों पर चोट है।स्वतंत्रता सैनानियों को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की है, तथा युवाओं में देशप्रेम की भावना जागृत करने का उद्योग किया है। काव्य में भाषा से अधिक भावों का महत्व होता है। अतःचिरागकाव्य संग्रह के लिए शिव सन्याल जी को हार्दिक बधाई। मां सरस्वती का आशीर्वाद सदैव आप पर बना रहे।

                                                                                             गोपाल शर्मा,   21,जय मार्कीट   कांगड़ा, हि.प्र.।

09 February 2024

दुनिया के होने की आवाज़

February 09, 2024 0

फेसबुक पर अशोक कुमार जी समीक्षा



 "दुनिया के होने की आवाज़" आधार प्रकाशन से आया कवि प्रदीप सैनी का पहला काव्य संग्रह है। ऑनलाइन पोर्टल्स और पत्र-पत्रिकाओं में समय-समय पर छपने वाले प्रदीप सैनी फिलहाल किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं।


जब मैं यह लिख रहा हूँ तो प्रदीप सैनी की कविताओं के विशुद्ध पाठक की तरह लिख रहा हूँ। प्रदीप सैनी मेरी नज़र में "आसान भाषा के मुश्किल कवि हैं।" कारण यह कि प्रदीप सैनी की कवितायें अपने अर्थ में खुलने के लिए कई-कई पुनर्पाठों की मांग करतीं हैं।


कविता देखिए:


"यात्राएँ प्यास से पैदा होती हैं

दरअस्ल वे पानी की तलाश हैं


हर प्यास का अपना पानी होता है

यात्रा पर निकलते हुए साथ लिया गया पानी

ज़्यादा देर काम नहीं आता।"


हम हमेशा सुनते आए हैं कि सीधे-सीधे सपाट तरीके से ही यदि बात कहनी है तो कविता से बेहतर गद्य में कही जा सकती है। कविता हमेशा सांकेतिक होती है, इस बात को प्रदीप सैनी न केवल बहुत बेहतर तरीके से समझते हैं बल्कि इसे आत्मसात भी करते हैं। वे कहते हैं:


"उस कवि को संदेह से देखना चाहिए

जिससे बहुत आवाज़ आती हो

और उन कविताओं को भी

जिनसे कोई आवाज़ न आती हो।"


ऑनलाइन प्लेटफार्मज़ और सोशल मीडिया पर कभी- कभार प्रदीप सैनी को पढ़ना मुझे हमेशा से ही उनकी कविताओं के प्रति आकर्षित करता रहा है। कभी- कभार इसलिए लिख रहा हूँ कि प्रदीप खुद कहते है कि वह बहुत कम कविता लिख पाते हैं। वह कहते हैं:


"कभी-कभी आत्मा में धंसी सिर्फ एक पंक्ति कहने को लिखता हूँ पूरी कविता"


शोशल मीडिया के दौर में फेसबुक पर एक-एक कवि के द्वारा रोज़ की कइयों कवितायें लिखकर पोस्ट किए जाने के दौर में प्रदीप सैनी के द्वारा कम लिखे जाने का कारण आप उनकी कविता पढ़कर ही जान सकते हैं। वे चार्ल्स बुकोस्कि की इस बात पर गहरे से आचरण करते हुए दिखाई देते हैं कि "अगर फूट के ना निकले/

बिना किसी वजह के/मत लिखो"।


प्रदीप सैनी की कवितायें समकालीन परिदृश्य को दर्ज करती हुई संवेदनहीन होते जा रहे समय की शिनाख्त करती हुई सवालों को एक फ़ांस की तरह वक्त के गले में छोड़ जाती हैं ताकि आने वाली पीढियां जब कविता की यह किताब खोलें तो इस वक्त को चिह्नने में कोई मुश्किल न हो।


कोरोनकाल के समय मजदूरों के पैदल पलायन पर लिखी कविता "उनके तलुओं में दुनिया का मानचित्र है" पूरी सभ्यता पर शालीनता से सवाल उठाती हुई निशब्द कर देती है। कविता देखिए:-


"हमारी सभ्यताओं का स्थापत्य उनके पसीने से जन्मा है

हमारी रोशनियों में चमकता लाल

उनके लहू का रंग है

कोई चौराहा उन्हें दिशाभ्रमित नहीं करता

वे जानते हैं कौन-सा है शहर से बाहर जाने का रास्ता


वे नहीं पूछेंगे हमसे

कौन-सी सड़क जाती है उनके गाँव

उन्हें याद हैं लौट जाने के सभी रास्ते


उनके तलुओं में दुनिया का मानचित्र है।"


कवि नागार्जुन को याद करते हुए प्रदीप लिखते हैं कि:


"सौ झूठ जीता हूँ

शुक्र है इतना कि कविता में सिर्फ़ सच लिखता हूँ


धूल भरे मौसमों में

मैली हुई आत्मा को धोने

कविता में लौटता हूँ बार-बार

हर बार गंदला करता हूँ उसका जल


बाबा, ये मैं कैसा कवि हूँ?"


उनकी कविताओं से गुजरने पे ऐसा लगता है कि ये ड्राफ्ट-दर-ड्राफ्ट सुधारी गई कवितायें नहीं बल्कि एक ही बार में फूट पड़ी वे संवेदनाएं हैं जिन्हें कागज़ पर यूँ का यूँ रख दिया गया है। इसलिए कहीं-कहीं शब्दों का आधिक्य तो नहीं किन्तु हल्की-फुल्की अड़चन दिख सकती है उच्चारण करते समय।


इन कविताओं से होते हुए हम एक ऐसे संसार में प्रवेश करते हैं जिसे केवल प्रदीप ही रच सकते हैं। जहां वह "आज़ाद औरतें" कविता लिखकर स्त्री मन को पढ़ते हुई छुपी हुई पितृसत्ता के ऊपर से एक झटके से चादर खींचकर एकदम उघाड़ देते हैं।


तिब्बती लड़की और बौद्ध भिक्षु से उनका संवाद कुछ गहरे प्रश्न छोड़ता है मस्तिष्क में। इन कविताओं के बहाने वह धर्म, धर्म की राजनीति, निर्वासन के दर्द और विद्रोह के प्रश्नों पर वो सवाल पूछते हैं जिन्हें कभी भुलाया नहीं जाना चाहिए था किंतु इतने सालों में शायद सभी भूलने लगे हैं धीरे-धीरे।


कविताओं से गुजरते आप कवि प्रदीप सैनी में, अपने समय को लेकर एक सजग व्यक्ति, वैश्विक विस्थापनों के प्रति संवेदनशील अध्येता और प्रेम में प्रेम से अधिक कुछ नहीं खोजने वाले एक अनकंडीशनल प्रेमी को पाएंगे।


"यह पिछली सदी के

उम्मीद भरे आखिरी दिनों की बात है

सदी बदलने से तो यूँ बदलने वाला कुछ नहीं था

पर तुम अचानक मिली जब मुझे

यकीन हो चला था

आने वाले समय में बेहतर होगी दुनिया

विलुप्त हुई नदियाँ

दन्तकथाओं से निकल धरती पर बहेंगी

बारूद सिर्फ दियासलाई बनाने के काम आएगा

और ऐसे ही न जाने कितने सपनों ने

आँखों में घोंसला बना लिया था

मैं साफ-साफ नहीं देख पाता था वक़्त।"


प्रदीप भाई आप यूँ ही रचते रहिए। फिलहाल आपको पहले संग्रह की बधाई और भविष्य के लिए हार्दिक शुभकामनाएं।


-अशोक कुमार