* सूत्रधर ओड़िया कविता संकलन * अनुवाद पारमिता षड़ंगी * समीक्षा ईप्सिता षड़ंगी *
29 February 2024
"सूत्रधर" कविता संकलन
"सम्बित के पास जब मैं नहीं थी" (कहानी संग्रह)
* पुस्तक समीक्षा "सम्बित के पास जब मैं नहीं थी" (कहानी संग्रह) * पारमिता षडंगीं
* समीक्षा * प्रदीप बिहारी बेगूसराय (बिहार) *
संवेदना को छूती कहानियां
25 February 2024
इस आदमी को बचाओ"
फेसबुक पर अशोक कुमार जी टिपण्णी
_________________
प्रिय कवि अजेय के इस संग्रह "इस आदमी को बचाओ" को आधार प्रकाशन से छपकर आये हुए लगभग एक वर्ष का समय होने को है।
कवि अजेय पर्वतीय संवेदनाओं के कवि हैं किंतु उनकी कविताओं में लाहुल का लोक ऐसे ही नहीं आता; वह आता है तीखे सवालों के साथ। उनकी कविताओं में पहाड़ सांस लेते हैं किंतु अंधुनिकता के अंधानुकरण के सामने तनकर खड़े होकर। नदिया बहती हैं; झरने गाते है किंतु अजेय की कविताएं उनके गान में बसी उन अव्यक्त पीड़ाओं को स्वर देती हैं जिन्हें आधुनिक होने के क्रम में हाशिए पर धकेल कर अनसुना करने की साजिशें रचने में लगे हैं पूंजी के पहरुए।
रोहतांग टनल बनते हुए कुछ चिंताएं यूं आती हैं:
"रूको दोस्त, सुनो -
यह जो छेद बनी है न
यहाँ तुम इस में यूँ दनदनाते हुए मत घुस जाना
कि हम जो वहाँ के पत्थर हैं
मिट्टी हैं, झरने हैं,
फूल पत्तियां और परिंदे हैं
और पेड़ हम अपनी जगह से उखड़ने न लग जाएं"
किंतु इस कवि को केवल आंचलिक अभव्यक्ति के साथ नत्थी कर देना इनके विस्तृत कविकर्म के साथ अन्याय होगा। इसलिए कवि अजेय को केवल पहाड़ी संवेदनाओं का कवि कहना उचित नहीं होगा। उनके कवित्व का फलक इतना बड़ा है कि वह समूचे विश्व की टीस को कुछ पंक्तियों में समेट लेने का हुनर रखते हैं:
"मेरा गाँव गज़ा पट्टी में सो रहा था
-------------------------
वह आकाश की ओर देखती थी
गाँव की छत पर लेटी एक छोटी बच्ची
दो हरी पत्तियों और एक नन्हे से लाल गुलाब की उम्मीद में जब कि एक बड़ा सा नीला मिज़ाईल
जिस पर बड़ा सा यहूदी सितारा बना है
गाँव के ठीक ऊपर आ कर गिरा है
जहाँ 'इरिगेशन' वालों का टैंक है (यह मेरा ही गाँव है) धमक से उस की पीठ के नीचे काँपती है धरती
(यह मेरी ही पीठ है)"
ये कवितायें अपने अतीत की टोह लेती हैं, वर्तमान की पीड़ाओं को अभिव्यक्त करती हैं और भविष्य की चिंताओं के साथ आपके ज़ेहन में जरूरी सवालात छोड़ जाती हैं:
"वहाँ कम्पनी दफ्तर के बाहर
इकट्ठे हो रहे हैं गांव के लोग
क्या ये विरोध करेगें ?
क्या ये विरोध कर पाएगें?"
तथाकथित विकास के साथ जो छोटी–छोटी चीजें हमारी संस्कृति पर अनायास ही हावी हो रहीं हैं उन्हें सूक्ष्मता से दर्ज करना अजेय बहुत बेहतरी से जानते हैं:
"मुद्दे ही मुद्दे हैं
और एन जी ओ ही एन जी ओ हैं
कल्चर का उत्थान हो रहा है
माँसाहारी देवी देवता वैष्णव हो रहे हैं
बकरों के सिर नारियल हो रहे हैं
गूर और कारदार
वेद पढ़ रहे हैं संस्कृत हो रहे हैं
बोली का लहजा सपाट हो रहा है"
वैश्वीकरण के बाद मुनाफाखोरों ने जिस तरह विकास का नकाब ओढ़कर संसाधनों की लूट करने की इतनी सारी योजनाएं बनाई हैं, उन्हें समझने के लिए अजेय जी की कवितायें आपके मन में कोई खिड़की भले न खोलें किन्तु इतना सुराख तो कर ही देतीं हैं कि रौशनी की कोई किरण चुपचाप प्रवेश कर सके।
बदलती परिस्थितियों में जहां बेरोजगारी बढ़ी है रोजगार के अवसर कम हुए हैं तो माइग्रेशन भी बढ़ा है। इस समस्या को अलग एंगल से देख रहे हैं अजेय।
"बड़े सस्ते में तीन बिहारी बच्चे ले के लौट रहा हूँ
बाल श्रमिक पुनर्वास केंद्र से
दो को ऑरचर्ड भेज रहा हूँ
एक को घरेलू काम सिखाऊँगा"
उनकी कविताएं छोटी पंक्तियों में बड़े और कठिन सवाल करती हैं। जैसे:
"पान सिगरेट के अड्डों पर पार्टी कार्यालय खुल गए हैं"
"वर्ण व्यवस्था और राष्ट्र में से पहले किस बचाना है समझ नहीं आ रहा है"
अजेय की कविताओं में यदि अंधाधुनिकता की चिंता है तो प्रेम से पगी संवेदनाएं भी हैं जो आपको आपके अतीत में ले जाकर भीतर से गुदगुदा देती हैं।
"सुन लड़की!
चौथी जमात में
मेरे बस्ते से पाँच खूबसूरत कंकरों के साथ
एक गुलाबी रिबन और दो भूरी आँखें गुम हो गईं थीं
कहीं गलती से तेरी जेब में तो नहीं आ गई"
इस संग्रह में कविताओं पर कविता है, कवियों पर कविता है, विमर्शों पर राजनीति पर और विमर्शों की राजनीति पर भी कविताएं हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें आदमी को बचाने की कविता है।
बेहतरीन संकलन के लिए आधार प्रकाशन और अजेय भाई को हार्दिक बधाई।
–अशोक कुमार
22 February 2024
पुस्तक समीक्षा काव्य संग्रह--चिराग
* पुस्तक समीक्षा काव्य संग्रह--चिराग * लेखक-शिव सन्याल * समीक्षा * गोपाल शर्मा *
एक इंजीनियर के मन मस्तिष्क से जब कविता जन्म लेती है तो मानवता में प्रकाश फैलाने के लिए “चिराग” स्वयमेव प्रजवलित हो जाते हैं। ऐसा ही कुछ शिव सन्याल जी ने किया है। देवभूमि हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिला की ज्वाली तहसील के गांव मकड़ाहन के सन्याल बंधु साहित्य के क्षेत्र में किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। शिव सन्याल कविसम्मेलनों की शान और जान हैं।शिव सन्याल जी की कविता जितनी सशक्त होती है उतनी ही शानदार इनकी प्रस्तुति होती है।
प्रस्तुत काव्य संग्रह “चिराग”
शिव सन्याल जी की हिन्दी कविताओं का सुंदर गुलदस्ता है। गुरु वंदना
से शुरू हो कर कई प्रकार के भावों को अपने में समेटता हुआ, विविध
रसों का आस्वादन कराता हुआ संसार को एक मेला बता कर काव्य संग्रह की इतिश्री कर
देता है।गुरु वंदना में शब्दों से अधिक भावना का महत्व है।
गुरु सानिध्य
प्यार का, मिटे कष्ट
अपार।
गुरु आशीष जिसे मिले,मन का
मिटे विकार।
देवधरा हिमाचल का गुणगान भी बहुत ही सुंदर शब्दों में किया गया है।
हरियाली से है हराभरा, हिमाचल
देवभूमि का भाल।
हिन्दू, मुस्लिम,
सिख, इसाई
का प्यारा हिंदुस्तान हूँ।
जिस घर में बेटी नहीं
होती, ममता घुट घुट के रोती है।
चिपके रहते
जोंक से, बन
के रिश्ते खास।
अधुनिकता अब छा गई है, हर
नर और नार में।
मेरा मन भीतर
है रोता,
जाऊं प ढ़ने मैं इसबार।
छोड़ बंधन यह सारे, चले
इक दिन जाना है।
09 February 2024
दुनिया के होने की आवाज़
फेसबुक पर अशोक कुमार जी समीक्षा
"दुनिया के होने की आवाज़" आधार प्रकाशन से आया कवि प्रदीप सैनी का पहला काव्य संग्रह है। ऑनलाइन पोर्टल्स और पत्र-पत्रिकाओं में समय-समय पर छपने वाले प्रदीप सैनी फिलहाल किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं।
जब मैं यह लिख रहा हूँ तो प्रदीप सैनी की कविताओं के विशुद्ध पाठक की तरह लिख रहा हूँ। प्रदीप सैनी मेरी नज़र में "आसान भाषा के मुश्किल कवि हैं।" कारण यह कि प्रदीप सैनी की कवितायें अपने अर्थ में खुलने के लिए कई-कई पुनर्पाठों की मांग करतीं हैं।
कविता देखिए:
"यात्राएँ प्यास से पैदा होती हैं
दरअस्ल वे पानी की तलाश हैं
हर प्यास का अपना पानी होता है
यात्रा पर निकलते हुए साथ लिया गया पानी
ज़्यादा देर काम नहीं आता।"
हम हमेशा सुनते आए हैं कि सीधे-सीधे सपाट तरीके से ही यदि बात कहनी है तो कविता से बेहतर गद्य में कही जा सकती है। कविता हमेशा सांकेतिक होती है, इस बात को प्रदीप सैनी न केवल बहुत बेहतर तरीके से समझते हैं बल्कि इसे आत्मसात भी करते हैं। वे कहते हैं:
"उस कवि को संदेह से देखना चाहिए
जिससे बहुत आवाज़ आती हो
और उन कविताओं को भी
जिनसे कोई आवाज़ न आती हो।"
ऑनलाइन प्लेटफार्मज़ और सोशल मीडिया पर कभी- कभार प्रदीप सैनी को पढ़ना मुझे हमेशा से ही उनकी कविताओं के प्रति आकर्षित करता रहा है। कभी- कभार इसलिए लिख रहा हूँ कि प्रदीप खुद कहते है कि वह बहुत कम कविता लिख पाते हैं। वह कहते हैं:
"कभी-कभी आत्मा में धंसी सिर्फ एक पंक्ति कहने को लिखता हूँ पूरी कविता"
शोशल मीडिया के दौर में फेसबुक पर एक-एक कवि के द्वारा रोज़ की कइयों कवितायें लिखकर पोस्ट किए जाने के दौर में प्रदीप सैनी के द्वारा कम लिखे जाने का कारण आप उनकी कविता पढ़कर ही जान सकते हैं। वे चार्ल्स बुकोस्कि की इस बात पर गहरे से आचरण करते हुए दिखाई देते हैं कि "अगर फूट के ना निकले/
बिना किसी वजह के/मत लिखो"।
प्रदीप सैनी की कवितायें समकालीन परिदृश्य को दर्ज करती हुई संवेदनहीन होते जा रहे समय की शिनाख्त करती हुई सवालों को एक फ़ांस की तरह वक्त के गले में छोड़ जाती हैं ताकि आने वाली पीढियां जब कविता की यह किताब खोलें तो इस वक्त को चिह्नने में कोई मुश्किल न हो।
कोरोनकाल के समय मजदूरों के पैदल पलायन पर लिखी कविता "उनके तलुओं में दुनिया का मानचित्र है" पूरी सभ्यता पर शालीनता से सवाल उठाती हुई निशब्द कर देती है। कविता देखिए:-
"हमारी सभ्यताओं का स्थापत्य उनके पसीने से जन्मा है
हमारी रोशनियों में चमकता लाल
उनके लहू का रंग है
कोई चौराहा उन्हें दिशाभ्रमित नहीं करता
वे जानते हैं कौन-सा है शहर से बाहर जाने का रास्ता
वे नहीं पूछेंगे हमसे
कौन-सी सड़क जाती है उनके गाँव
उन्हें याद हैं लौट जाने के सभी रास्ते
उनके तलुओं में दुनिया का मानचित्र है।"
कवि नागार्जुन को याद करते हुए प्रदीप लिखते हैं कि:
"सौ झूठ जीता हूँ
शुक्र है इतना कि कविता में सिर्फ़ सच लिखता हूँ
धूल भरे मौसमों में
मैली हुई आत्मा को धोने
कविता में लौटता हूँ बार-बार
हर बार गंदला करता हूँ उसका जल
बाबा, ये मैं कैसा कवि हूँ?"
उनकी कविताओं से गुजरने पे ऐसा लगता है कि ये ड्राफ्ट-दर-ड्राफ्ट सुधारी गई कवितायें नहीं बल्कि एक ही बार में फूट पड़ी वे संवेदनाएं हैं जिन्हें कागज़ पर यूँ का यूँ रख दिया गया है। इसलिए कहीं-कहीं शब्दों का आधिक्य तो नहीं किन्तु हल्की-फुल्की अड़चन दिख सकती है उच्चारण करते समय।
इन कविताओं से होते हुए हम एक ऐसे संसार में प्रवेश करते हैं जिसे केवल प्रदीप ही रच सकते हैं। जहां वह "आज़ाद औरतें" कविता लिखकर स्त्री मन को पढ़ते हुई छुपी हुई पितृसत्ता के ऊपर से एक झटके से चादर खींचकर एकदम उघाड़ देते हैं।
तिब्बती लड़की और बौद्ध भिक्षु से उनका संवाद कुछ गहरे प्रश्न छोड़ता है मस्तिष्क में। इन कविताओं के बहाने वह धर्म, धर्म की राजनीति, निर्वासन के दर्द और विद्रोह के प्रश्नों पर वो सवाल पूछते हैं जिन्हें कभी भुलाया नहीं जाना चाहिए था किंतु इतने सालों में शायद सभी भूलने लगे हैं धीरे-धीरे।
कविताओं से गुजरते आप कवि प्रदीप सैनी में, अपने समय को लेकर एक सजग व्यक्ति, वैश्विक विस्थापनों के प्रति संवेदनशील अध्येता और प्रेम में प्रेम से अधिक कुछ नहीं खोजने वाले एक अनकंडीशनल प्रेमी को पाएंगे।
"यह पिछली सदी के
उम्मीद भरे आखिरी दिनों की बात है
सदी बदलने से तो यूँ बदलने वाला कुछ नहीं था
पर तुम अचानक मिली जब मुझे
यकीन हो चला था
आने वाले समय में बेहतर होगी दुनिया
विलुप्त हुई नदियाँ
दन्तकथाओं से निकल धरती पर बहेंगी
बारूद सिर्फ दियासलाई बनाने के काम आएगा
और ऐसे ही न जाने कितने सपनों ने
आँखों में घोंसला बना लिया था
मैं साफ-साफ नहीं देख पाता था वक़्त।"
प्रदीप भाई आप यूँ ही रचते रहिए। फिलहाल आपको पहले संग्रह की बधाई और भविष्य के लिए हार्दिक शुभकामनाएं।
-अशोक कुमार




.png)








